भारतवर्ष
का भू-भाग अरुणाचल प्रदेश से गुजरात तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैला है।
क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व के देशों में इसका सातवाँ स्थान है। इतने विशाल देश
में अनगिनत जातियाँ-जनजातियाँ, भाषाएँ-बोलियाँ, लिपियाँ, मान्यताएँ, वेशभूषाएँ,
खान-पान और रीति-रिवाज ही नहीं बल्कि अनेक धर्म-देवी-देवता भी हैं,
जिनकी गणना करना एक कठिन कार्य
है। फिर भी, इन सब को एक ऐसे अदृश्य धागे ने पिरो रखा है,
जो भले ही बहुत महीन प्रतीत होती हो, लेकिन यह
इतनी मजबूत है कि टूटती नहीं और लोग इसकी रक्षा के लिए अपने प्राण तक न्योछावर
करने को तैयार रहते हैं।
भारत
की आत्मा को समझना हो,
तो उसके मंदिरों, तीर्थों और धार्मिक
परम्पराओं के पीछे विद्यमान उस आकांक्षा को समझना होगा, जो
मनुष्य को अपने से ऊपर किसी दिव्य सत्ता से जोड़ना चाहती है। भारत की एकता का
बुनियादी आधार इसी दैवीय निकटता की आकांक्षा में निहित है। यहाँ आस्था केवल किसी
धर्मग्रन्थ या सिद्धान्त तक सीमित नहीं रही; उसने जनजीवन,
संस्कृति और सामूहिक चेतना में गहरी जड़ें जमाई हैं।
देश
के छोटे-से-छोटे गाँव में भी शिव और शक्ति के प्राचीन मंदिर मिल जाते हैं।
देवी-देवताओं के मंदिर,
पवित्र नदियाँ, पर्वत और तीर्थस्थल हमारी
सांस्कृतिक चेतना के अभिन्न अंग हैं। मस्जिदों में इबादत करने वालों और गिरजाघरों
में प्रार्थना करने वालों की उपस्थिति भी इसी मानवीय आकांक्षा की अभिव्यक्ति है।
उपासना के रूप भिन्न हो सकते हैं, लेकिन मनुष्य के भीतर
श्रद्धा, आश्रय और किसी उच्चतर सत्य से जुड़ने की इच्छा
व्यापक रूप से एक समान विद्यमान है।
लेकिन
क्या केवल आस्था की उपस्थिति से एकता स्थापित हो जाती है? क्या एक ही धर्म को मानने वाले लोग हमेशा एक-दूसरे के प्रति सद्भाव रखते
हैं? क्या विभिन्न धर्मों को मनाने वालों के मध्य सद्भावना
हो सकती है? हमारे अपने अनुभव इन प्रश्नों का उत्तर देते
हैं। धार्मिक पहचान मनुष्यों को जोड़ती है, लेकिन उनके
व्यवहार में प्रेम, विश्वास और परस्पर सम्मान ही इस जुड़ाव को
अटूट बनाता है। एकता की वास्तविक परीक्षा केवल पूजा-स्थलों में ही नहीं, बल्कि हमारे दैनिक जीवन में भी होती है।
प्रसिद्ध
लेखक मार्क ट्वेन की सलाह थी—‘सदैव उचित कार्य करो।’ लेकिन उचित कार्य करने के लिए
यह समझना आवश्यक है कि उचित है क्या? इसका एक सरल और
व्यावहारिक आधार महात्मा गांधी ने सुझाया है — दूसरों के साथ वैसा ही
व्यवहार करना, जैसा हम अपने लिए चाहते हैं। हम चाहते हैं कि दूसरे हमारी भावनाओं का सम्मान करें, हमारी कठिनाइयों को समझें और हमारे साथ न्याय करें। तो क्या हमारा भी यह
दायित्व नहीं कि हम दूसरों के प्रति वैसी ही संवेदनशीलता रखें?
अल्बर्ट
स्वित्ज़र के अनुसार,
मनुष्य को उन जीवों की सहायता करनी चाहिए जिनकी वह सहायता कर सकता
है और किसी भी जीवित प्राणी को चोट पहुँचाने से बचना चाहिए। यह दृष्टि नैतिकता को
केवल सामाजिक शिष्टाचार तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे जीवन
के प्रति संवेदना और करुणा का व्यापक रूप देती है।
धर्म
और नैतिकता को प्रायः एक-दूसरे का पर्याय मान लिया जाता है। धर्म मनुष्य को दिव्य
सत्ता से जोड़ता है,
जीवन के गहरे अर्थ से परिचित कराता है; नैतिकता
उसे दूसरे मनुष्यों के साथ जोड़ती है और उनसे उचित व्यवहार करना सिखाती है। किसी
व्यक्ति का ईश्वर में विश्वास हो या न हो, समाज में उसके
आचरण का महत्त्व बना रहता है। परस्पर विश्वास, न्याय और
सम्मान के बिना कोई भी समाज सुचारु रूप से नहीं चल सकता।
हमारे
संबंध इसी विश्वास पर टिके होते हैं कि दूसरा व्यक्ति हमारे साथ कैसा व्यवहार
करेगा। जब हम जानते हैं कि कोई हमारी भावनाओं का आदर करेगा और आवश्यकता पड़ने पर
हमारा साथ देगा,
तो उसके प्रति हमारे मन में विश्वास उत्पन्न होता है। यह विश्वास एक
दिन में नहीं बनता; यह हमारे छोटे-छोटे व्यवहारों से विकसित
होता है, तब संबंधों में स्थिरता आती है और समाज में सहयोग
की भावना मजबूत होती है।
इस
नैतिक जीवन के लिए सहानुभूति और आत्म-संयम दोनों आवश्यक हैं। आवश्यक है कि हम अपने
क्रोध,
अहंकार और स्वार्थ पर नियंत्रण रखते हुए चोट पहुँचाने से बचें। इन
गुणों का विकास परिवार, शिक्षा और हमारे पारस्परिक संबंधों
से होता है। इसलिए एकता की नींव उन संस्कारों से भी पड़ती है जो हमें दूसरों
के प्रति उत्तरदायी बनाते हैं।
मानव
की नैतिक चेतना एक छोटे से दीपक की लौ के समान है, जो शक्ति,
लालच, आवेश और विचारधाराओं के प्रबल झोंकों
में डगमगा सकती है। उसे सँभालने के लिए सजगता, विवेक और
आत्म-संयम चाहिए।
भारत
की एकता का आधार तभी सार्थक होगा, जब वह हमारे आचरण में भी प्रकट
हो। दैवीय निकटता की आकांक्षा हमें ऊँचा उठाती है और नैतिकता हमें एक-दूसरे
के निकट लाती है। इन दोनों का मिलन ही एकता को जीवंत और स्थायी बनाता है।
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