मंगलवार, 21 जुलाई 2026

जंगल


 

          जंगल, यानि एक शहर, जहां प्रकृति निवास करती है, पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों, नदी-नालों और पहाड़ों के रूप में। यदा-कदा इंसान भी वहाँ पहुँचता था, सुकून खोजते, प्रकृति का आनंद लेने। लेकिन अब, उन्हें नष्ट करने। हम अब इन जंगलों-पहाड़ों में भी अपना शहर जबरन भरते जा रहे हैं। हमें इस बात की परवाह नहीं कि पहाड़ और जंगल हमारी आवश्यकता है, जीवन दायिनी है।

          बात शुरू हुई है जंगल से। एक इतना घना जंगल था कि दिन में भी अँधेरा रहता था। एक दिन, कुछ घुमक्कड़ इस जंगल में आये। बेचारे सुबह से शाम तक चारों तरफ दौड़-भाग करते रहे। थक कर चूर सब जंगल के बीच एक वटवृक्ष के नीचे आराम करने बैठ गये। एक-दूसरे से कह रह थे, "बाप रे बाप, कैसा भयंकर जंगल है, कितना ख़ौफ़नाक है!" थोड़ी देर बाद, सब चले गये।

        वटवृक्ष जो उनकी बातें ध्यान से सुन रहा था सोचने लगा, जंगल! क्या होता होगा यह जंगल? कोई प्राणी है? डरावना है? सोच-विचार के बाद उसने पास ही खड़े बाँस के झुण्ड से पूछा, "भइया बाँस, तुमने जंगल देखा है?" बाँस ने कहा, "जंगल! वो क्या होता है?" बरगद ने सोचते हुए कहा, "कोई खूँखार प्राणी होगा। अभी दोपाये आये थे न, वे उसकी बात कर रहे थे। बहुत ही डर रहे थे जंगल से। तुम तो बड़े लम्बे हो, ज़रा देखो न।" बाँस ने अपनी फुनगी उठा-उठा चारों तरफ़ नज़र डाली, फिर बोला, "नहीं, मुझे कोई नया प्राणी नहीं दीख रहा। हम शेर से पूछेंगे।” अब दोनों शेर की प्रतीक्षा करने लगे। कुछ देर बाद झरने का पानी पीने के लिए शेर आ निकला। दोनों ने चिल्ला कर पूछा, "शेर भइया रुको, तुमने जंगल देखा है?" शेर गुर्रा कर बोला, "वह कौन है?" बाँस बोला, "वह बड़ा ही ख़तरनाक जानवर है! दोपाया भी उससे डरता है।" शेर गरजा, "अगर वह इधर आये तो मुझे बुला लेना, मैं उसका भुरता बना दूँगा।" यह कह कर गुर्राता हुआ शेर चला गया। दोपहर को एक चील बरगद की शाखा पर आ बैठी। बरगद ने कहा, "चील बहन, तुम तो सब जगह घूमती-फिरती हो, आज हमने एक नये जानवर का नाम सुना, उसे जंगल कहते हैं, तुमने कहीं देखा है?" चील ने सीटी बजायी, फिर बोली, "जंगल नाम का प्राणी तो नहीं देखा मैंने, अगर दिखायी दिया तो यहाँ आकर ज़रूर बताऊँगी।" वह अपने पंख खोल आकाश में यह जा, वह जा।

अब बाँस और बरगद सोचने लगे, "शेर को नहीं मालूम, चील को नहीं मालूम, क्या पता यह प्राणी पाताल में रहता हो। हमें साँप से पूछना चाहिये।" रात होते ही साँप बाहर घूमने निकला। बरगद और बाँस को नींद कहाँ? साँप को देखते ही बोल उठे, "साँप भइया, तुम तो ज़मीन के नीचे रहते हो, तुमने जंगल नाम का प्राणी देखा है?" साँप ने कुण्डली मार कर सोचा, फिर बोला, "नहीं, मैंने नहीं देखा, हमारे पड़ोस में चींटी, मकौड़े, कई कीड़े और कभी-कभी बिच्छू होते हैं, लेकिन जंगल को नहीं देखा।"

        दूसरे दिन सुबह एक नयी गौरैया आयी, बड़ी प्रसन्न थी, नाच रही थी, चहक रही थी। कह रही थी, "हाश! छूटे उस शहर से, आदमी साँस लेने नहीं देते थे। इधर से भगाते थे, उधर से भगाते। हमारे लिए कहीं घोंसला बनाते भी नहीं थे और बनाने भी नहीं देते थे। अब तो शहर से यह जंगल ही अच्छा है।

          "जंगल? जंगल का नाम सुनते ही बरगद और बाँस चौकन्ने हो गये, पूछा, "जंगल! वह क्या होता है?" चिड़िया चहकी और बोली, "अरे, हम-तुम सभी तो जंगल के ही हिस्से हैं, देखो न, कितने सारे पेड़-पौधे, जहां-तहां एक साथ रहते हैं, कितनी बेलें हैं, न जाने कितने पशु-पक्षी-जानवर, कीड़े-मकोड़े, साँप-बिच्छू हैं। यहाँ इंसान नहीं रहता, इससे तो इंसान डरता है!" यह सुनते ही बरगद और बाँस खुश हो गए। जिस जंगल को लेकर वे सब इतने परेशान हो रहे थे उसका पता शहर से आई एक चिड़िया ने इतनी सहजता से दे दिया। और जंगल के सारे पेड़ के पत्तों ने अपनी डालियाँ हिला-हिला कर शोर मचाया, "हम जंगल हैं! हम जंगल हैं!" शेर भी ज़ोर से गरजा, "मैं जंगल हूँ।” सारे वृक्ष, पशु-पक्षी अपनी शक्ति से सचेतन होकर एक ही हुंकार में बोल उठे, "जंगल! भयंकर जंगल!"

        हम अपने भोग के लिए शहरों को तो जंगल बना चुके हैं और अब जंगलों का भी हाल शहरों सा ही करने में लगें हैं। लेकिन जंगल के बाद क्या? क्या चाँद और मंगल पर रहेंगे? लेकिन क्या उन्हें भी पृथ्वी नहीं बना डालेंगे? सुनने में आता है कि अन्तरिक्ष में भी कूड़े के ढेर जमा होने लगे हैं। चारों तरफ खोज रहे हैं, देख रहे हैं। भूल गए, ऋषि-मुनि कह गए – कहीं दौड़ने की जरूरत नहीं है, बाहर खोजना नहीं है क्योंकि जो हमें चाहिए वह बाहर नहीं हमारे अपने अंदर ही है। समस्या यहीं से प्रारम्भ होती है। बाहर देखना तो हम जानते हैं लेकिन अंदर देखना हम सीखे ही नहीं। हमें अभी अंदर देखना सीखना है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हमारे पास उसे सीखने का न समय है और न ही धैर्य। 

          बिना यह सोचे कि लोग क्या कर रहें हैं हम अपने आप को बदलने की कोशिश कर  सकते हैं? एक से दो, दो से चार, चार से आठ, और इस प्रकार पूरी दुनिया बदल सकती है। दलाई लामा के शब्दों में  –

गलत गलत है,  भले ही हर कोई कर रहा हो,

सही सही है, भले ही कोई नहीं कर रहा हो।

गलत को छोड़ें, सही को अपनाएं 

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

लाइक करें, सबस्क्राइब करें, परिचितों से शेयर करें।

 

यूट्यूब  का संपर्क सूत्र :

https://youtu.be/kUu6_h8nTbE


जंगल

            जंगल , यानि एक शहर , जहां प्रकृति निवास करती है , पशु-पक्षियों , पेड़-पौधों , नदी-नालों और पहाड़ों के रूप में। यदा-कदा इंसान...