रविवार, 21 जून 2026

असंभव से संभव


 


प्राथमिक विद्यालय के नए सत्र का आज पहला दिन था। पाँचवीं कक्षा की अध्यापिका नीरजा ने मुस्कान भरी नजरों से अपने विद्यार्थियों का अभिनंदन किया। लेकिन तभी उनकी नजर आखिरी पंक्ति में बोरे की तरह बैठे सींकिया-से आशीष के भाव-विहीन चेहरे पर ठहर गई। आशीष न ठीक से खेलता था, न ही अच्छी तरह पेश आता था। उसके कपड़े भी बड़े अस्त-व्यस्त और मैले होते। अब वही मैला-कुचैला आशीष गठरी बना उनकी कक्षा में बैठा था।

नीरजा ने सभी बच्चों की पिछली रिपोर्ट देखीं। आशीष की रिपोर्ट देख वे चौंक उठीं। दूसरे दर्जे की अध्यापिका ने लिखा था, "आशीष लाजवाब विद्यार्थी है, सभी का प्यारा, लेकिन कभी-कभी बड़ा गुमसुम, दुःखी-सा रहता है क्योंकि उसकी माँ सख़्त बीमार है।"

तीसरे दर्जे की रिपोर्ट थी, "माँ की मृत्यु ने आशीष पर गहरा असर डाला है। वह अपना अच्छे-से-अच्छा करना चाहता है, लेकिन घर पर पिता कोई दिलचस्पी नहीं रखते। बच्चे के लिए कुछ करना ज़रूरी है।"

चौथे दर्जे की अध्यापिका ने लिखा था, "आशीष बहुत चुपचाप रहता है, न कक्षा में कोई रस लेता है, न खेल के मैदान में। न उसके दोस्त हैं। कक्षा में बैठा-बैठा सोता रहता है -असम्भव छात्र। कुछ तो करना होगा..."

नीरजा चिंतन करने लगी। "कुछ करना होगा", "असम्भव छात्र"...

हम नीरजा और आशीष को यहीं छोड़ चलते हैं शहर के एक दूसरे कोने में जहां बड़ी भीड़-भाड़ है, रेलम-पेल है। पहली बार विद्यार्थियों की सुविधा के लिए शहर के समस्त कॉलेज के पदाधिकारियों और छात्रों को एक सभागार में एकत्रित किया गया है।  सभागार के बाहर कॉलेज में दाखिले के लिए आवश्यक सूचनाएँ और आवेदन पत्र उपलब्ध हैं।

सबसे ज्यादा उत्तेजना थी सभागार में। जहां कॉलेज के पदाधिकारी अपने कॉलेज के छात्रों की उपलब्धियां गिना रहे थे। यथा, एक ने बताया कि परीक्षा में हमारे बच्चों का परिणाम शत-प्रतिशत रहा, और ऐसा पिछले बीस वर्षों से हो रहा है। दूसरे ने बताया कि हमारे यहाँ दाखिले के लिए कट-ऑफ है 98%। तीसरे न कहा हमारे यहाँ 99% से कम अंक पाने वाले छात्रों को दाखिले के लिए आवेदन पत्र ही नहीं दिया जाता है, तो चौथे ने बताया कि 97% से कम अंक वाले छात्रों को हमारे यहाँ दाखिला नहीं मिलता। चौथे-पांचवे-छठे आदि ने गिनाए कि उनके यहाँ से निकले बच्चे देश-विदेश के किस कोने में और किस पद पर हैं। वे  किन संस्थानों के किन पोस्ट  पर नियुक्त हैं, कैम्पस इंटरव्यू में उनके बच्चों को कितने रुपयों की प्रारम्भिक मासिक-वेतन का प्रस्ताव मिला आदि। कइयों ने उनके यहाँ पढ़े उन छात्रों के नाम गिनाए जिनको पूरा देश-संसार जानता है। तो कई ऐसे भी थे जो अपने कॉलेज के उन प्रतिष्ठित अध्यापकों, प्राध्यापकों, प्रबन्धकों के नाम गिनाए जो खुद चलते-फिरते विश्व-विद्यालय थे। वहाँ उपस्थित हर बच्चा एक ही सपना देख रहा था – किसी प्रकार इस कॉलेज में “दाखिला फिट तो जिंदगी सेट”।   

इसी बीच एक और कॉलेज के पदाधिकारी शांत लेकिन दृढ़ कदमों से आकार माइक के सामने खड़े हुए और अपने कॉलेज का नाम बताया। कॉलेज का नाम सुनते ही सभागार एक जोरदार ठहाके से गूंज उठा। किसी बच्चे का मज़ाक उड़ाने के लिए कहा जाता था – इसका दाखिला तो इस कॉलेज में भी नहीं होगा। जब तालियाँ नहीं थमीं तो उन्होंने सधी आवाज में कहा, “बच्चों इन तालियों को बचा कर रखो, मैं जब माइक से हटूँगा तब तुम्हें इनकी जरूरत पड़ेगी।” उन्होंने कहना शुरू किया – अगर हम किसी सन्दूक में लोहा, किसी में चाँदी, किसी में सोना और किसी में हीरा भर कर रख दें, और फिर उसे कई वर्षों के बाद उन्हें खोलें तो उनमें से क्या निकलेगा? जो डाला है वही तो निकलेगा? लोहे में से लोहा, चाँदी से चाँदी, सोने से सोने और हीरे से हीरा ही तो निकलेगा! मतलब, सन्दूक ने कुछ नहीं किया, जो उसे मिला वही उसने निकाल दिया। हम अपने संदूकों में लोहा भरते हैं लेकिन हमारे पास वह जादूई तकनीक है, प्राध्यापक हैं इस लोहे को चाँदी, सोना और कभी-कभी हीरे में भी परिवर्तित कर देते हैं। हाँ लोहा भी रहता है लेकिन वह अच्छे से गैलवेनाइजड हो चुका होता है। हमारे यहाँ बच्चे प्राध्यापकों के साथ नहीं बल्कि हमारे प्राध्यापक बच्चों के साथ काम करते हैं। हम बेहतरीन बच्चों को नहीं लेते लेकिन जब वे हमारे यहाँ से निकलते हैं वे बेहतरीन बन चुके होते हैं। यह है हमारा और हमारे प्राध्यापकों का कमाल। हम आपके साथ मेहनत करने तैयार हैं, क्या आप भी तैयार हैं?” सब बच्चे खड़े हो गये, तालियों की गड़गड़ाहट से सभागार गूंज उठा और उनके बीच एक आवाज आई – “हाँ हम तैयार हैं”

अब हम इन्हें यही छोड़ चलते हैं नीरजा के पास, जो उलझी हुई है आशीष के साथ। बुदबुदा रही है - "कुछ करना होगा", "असम्भव छात्र"... और उसने ठान लिया वह कुछ करेगी, संभव करेगी। प्रारम्भ किया सिर्फ एक मुस्कुराहट से। अध्यापिका की मधुर मुस्कान से एकबारगी आशीष चौंक गया, खुद-ब-खुद सीधा बैठ गया। खेल के मैदान में भी शिक्षिका की मुस्कान से भेंट होते ही उसके अंगों में हरकत होने लगी। उसका जीवन बदलने लगा। पाँचवीं कक्षा के सालाना इम्तिहान में अव्वल आया - आशीष।

कालांतर में शहर बदला, राज्य बदला, देश भी। लेकिन संपर्क बना रहा। कई वर्षों के बाद आशीष का पत्र आया यह बताने कि वह डॉक्टर बन गया है, भावी पत्नी से मिल चुका है और परिणय सूत्र में बँधने वाला है। उसने यह भी बताया कि वह अपने पिता को भी खो चुका हूँ, और आगे लिखा - आपको कृपा करके हमारे विवाह में वह स्थान ग्रहण करना है जो माँ का होता है? फ्लाइट की टिकट भिजवा रहा हूँ।

संभव को तो सब संभव बनाते है, असंभव को संभव बनाने वाला ही, असंभव होता है।

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यूट्यूब  का संपर्क सूत्र

https://youtu.be/ApvQ97YBYLE

असंभव से संभव

  प्राथमिक विद्यालय के नए सत्र का आज पहला दिन था। पाँचवीं कक्षा की अध्यापिका नीरजा ने मुस्कान भरी नजरों से अपने विद्यार्थियों का अभिनंदन किय...