(मैं
हृदय से ऋणी हूँ जाँ हूस्टन का जिन्होंने अपना अनुभव हमसे साझा किया और ‘अग्निशिखा’ का जिसने इसे हम तक पहुंचाया)
आप इतनी ख़ुश क्यों हैं?
1मैं
वह दिन कभी नहीं भूल पाऊँगा जब हेलेन केलर हमारी कक्षा में आयी थीं। तब मैं छठी
में पढ़ता था। वे उस समय पैंसठ-सत्तर के बीच की होंगी। मुझे याद है, लम्बी-चौड़ी महिला जिनसे किरणें फूट रही थीं। उनकी आँखें, कुछ न देखते हुए भी, सब कुछ देख रही थीं। संसार का
स्वागत करती हुई उनकी वह मुस्कान, चारों तरफ़, कितनी कृपा और भलाई बिखेर रही थी! मैंने अपने जीवन में ऐसे किसी को कभी
नहीं देखा... उनकी उपस्थिति हर्ष और उल्लास से कितनी भरपूर थी।
जब
उन्होंने बोलना शुरू किया,
उनकी वाणी बहुत अस्पष्ट ज़रूर थी, पर मुझे
पैग़म्बर की वाणी सुनायी दी। स्वर के उनके वे उतार-चढ़ाव और वे उच्चारण क्या किसी
ऐसे के थे जिसने वाणी कभी सुनी ही नहीं! जब वे थमीं तो मैंने अनुभव किया कि वे
मेरे अन्दर गहराई में उतर गयीं, और मैं जानता था कि मुझे
जाकर उनसे बातें करनी ही होगी। मुझे मालूम नहीं मैं क्या कहना चाहता था, लेकिन इतना जानता था कि मुझे उनसे बातें करनी ज़रूर हैं। जब उनके साथी ने
घोषणा की, "तुम बच्चों में से किसी के पास कोई प्रश्न
है क्या?" तो मेरे साथी झेंप से गये, बग़लें झाँकने लगे, लेकिन मेरा हाथ अपने-आप उठ गया,
और मेरे पैर स्वतः उनकी ओर बढ़ने लगे।
मिस
केलर ने मेरा प्रश्न पढ़ने के लिए अपना पूरा हाथ मेरे चेहरे पर रख दिया। उनकी
उँगलियों ने मेरे चेहरे के हाव-भाव पढ़े, जब कि हथेली के बीच
का हिस्सा मेरा प्रश्न पढ़ने के लिए मेरे होठों पर टिक गया। तब तक मुझे मालूम नहीं
था कि मैं क्या पूछने वाला हूँ। उनका हाथ मेरे चेहरे से हटा नहीं।
2आख़िर
मेरे हृदय में जो था वह प्रश्न के रूप में फूट पड़ाः "आप इतनी ख़ुश क्यों हैं?"
उनकी
हँसी फूट पड़ी,
ठहाकों में गूंज उठी - वे ठहाके किसी दूसरे ही लोक के लग रहे थे - घने
वन में सरसराती हवा के साथ वृक्षों की हँसी-भरी खनक और जो गूँज प्रतिध्वनित होती
है न, वैसी थी उनकी वह हँसी।
"मेरे बच्चे", वे बोलीं, (वास्तव
में हेलेन बातें नहीं कर सकती थीं, लेकिन अथक प्रयास के बाद
टूटे-फूटे स्वरों के साथ काम चला लेती थीं।) स्वरों के उतार-चढ़ाव के बीच उनके
हृदय का यह अपूर्व सत्य मेरे अन्तरतम में जा बसा - "मैं इसलिए हमेशा, हमेशा खुश रहती हूँ क्योंकि मैं हर रोज़ इस तरह बिताती हूँ मानों वह
मेरी ज़िन्दगी का आख़िरी दिन हो। और तब ज़िन्दगी अपने हर क्षण में,
कण-कण में कितनी भव्य, कितनी सुन्दर दिखने
लगती है। यही है मेरी पल-पल की ख़ुशी का रहस्य!"
3मैं उन्हें
एकटक निहारता रहा - क्या ये ही वे महिला हैं जो सब कहते हैं कि न देख सकती हैं, न सुन सकती हैं और न ही सचमुच बोल सकती हैं...!
ताज्जुब
है लोग ऐसा क्यों कहते हैं कि वे न देख सकती हैं, न बोल सकती
हैं, न सुन सकती हैं। मुझे तो ऐसा लगता है कि वे जो देख, सुन और बोल सकती हैं वैसा न कोई बोल सकता है, न देख
सकता है न सुन सकता है!
मुझे
आज भी लगता है कि वे इन पल-दो-पल में मुझे सारी ज़िन्दगी की सच्चाई दिखा गयीं, सुना गयीं, और बखूबी बता गयीं।
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