अभी, कुछ समय के अंतराल पर देश के कई राज्यों में मेरे साथ कई किस्से हुए, जिन्हें मैं पचा नहीं पाया, क्योंकि हम ऐसे वातावरण
में पले-बढ़े नहीं थे। बे-वजह और अंजान लोगों को, मेहमानों को
उपहार-सहायता लिया-दिया करते थे। इसमें न कोई बुरा मनाने की बात थी न ही इंकार
करने की। लेकिन अब शायद ऐसा नहीं रहा। शायद लोगों का अहम या हीन भावना आड़े आ जाती है।
और मैं शायद अभी भी उसी पुराने समय से चिपका हुआ हूँ। किसी समय का यह अधिकार, भाईचारा-अपनेपन का अहसास नहीं रहा? इसके विपरीत अब
लोग यह अपमानित अनुभव करने लगे या शायद यह सोचने लगे कि ‘शो
ऑफ’ या पैसे का अहंकार या कुछ और दिखा रहा है।
शायद पहले यह “मैं” कम था अब इस “मैं” ने बहुत गहरी जड़ पकड़ ली है!
दक्षिण
भारत के एक शहर में गया था। वहाँ अपने एक परिचित परिवार से मिलने गया। उनसे कुछ
वर्ष पहले ही एक धार्मिक स्थान पर मुलाक़ात हुई थी। नया रिश्ता था और काफी घनिष्ठता
हो गई थी। मेरा आदर करती थी। वे प्रायः अपनी पारिवारिक उलझनें बतातीं या आध्यात्मिक
प्रश्न करती, जिन्हें मैं सुलझाता या उत्तर देता। टेलीफोन पर उनसे बराबर संपर्क बना
रहा। मन था कुछ उपहार ले चलूँ, लेकिन हो नहीं पाया। वहीं बातचीत
के दौरान मुझे लगा कि उसे एक जैकेट चाहिए। जब दुबारा गया तब मैं जैकेट ले गया। लेकिन
यह क्या? जैसे बहुत बड़ा अपराध हो गया। कहाँ क्या गलती हो गई
है? वे किसी भी अवस्था में उपहार रखने को तैयार ही नहीं हुई।
मेरा मन खराब हो गया। मेरे मुरझाये चेहरे को देख उसने भारी मन से रख लिया। लेकिन ऐसा
क्यों हुआ? मैं आजतक समझ ही नहीं पाया?
एक
अन्य शहर में मैंने ऑनलाइन सफ़ेद जूता लिया। लेकिन मेरे पैरों में छोटा था, नहीं पहन सका। जूते नए थे और ब्रांडेड थे, अतः फेंकने
का मन भी नहीं हुआ, किसी उपयुक्त व्यक्ति की खोज में लगा रहा
जिसे दिया जा सके। तभी, एक परिचित युवा सफ़ेद जूते खोजता
पहुंचा। उसे तुरंत चाहिए था, किसी कार्यक्रम के लिए। बिना
सफ़ेद जूते के वह भाग नहीं ले सकता था। बाजार से लाने का समय नहीं था। मैंने उसे दिखाया, उसने पहना, उसे बहुत पसंद भी आया। हम दोनों ले-दे
कर बड़े खुश हुए। कार्यक्रम के पश्चात उसने बताया कि वह उन जूतों की सफाई करके वापस
ला देगा। मैंने उसे पूरी बात बताई, और कहा कि वापस नहीं लौटाना
है मैं वापस नहीं लूंगा। बताया, जूते नए हैं और मेरे काम के नहीं हैं। लेकिन वह नहीं माना और उन्हें छोड़
गया। मैं मन मसोस कर रह गया।
दोनों
ही बार दिल में ठेस लगी। शायद अब किसी को कुछ दे न पाऊँ। एक छोटे से शहर में एक
परिचित के पास गया था। उन्होंने मुझे एक कीमती ब्रांडेड जूता दिया। मैंने पहना, मैंने रख लिया। दोनों खुश हुए। ‘धन्यवाद’, नहीं दोनों को खुशी मिली।
अभी
कल ही एक पत्रिका “अग्निशिखा” में यह पढ़ा तो एक नया विचार आया कि दूसरे को देखने के पहले
अपने-आप को देखूँ।
“दुनिया
में एक ही ऐसा व्यक्ति है जो तुम्हें वास्तव में खुश कर सकता है। दुनिया में एक ही
ऐसा व्यक्ति है जो तुम्हें वास्तव में दुःखी कर सकता है। आइये, उससे मिलें और उसे थोड़ा गहराई से जानने का प्रयत्न करें! मिलिये ख़ुद से, आईने में। सोचिये-समझिये, देखिये-परखिये। क्योंकि इसी
व्यक्ति पर काम करना है, इसी के दुर्गुणों को सद्गुणों में
बदलना है, फिर खुद से पल-पल, हर क्षण मुझे
अपने अन्दर झाँक कर, हर कोने में रोशनी डाल कर सारी चिपकी कालिमा
को रगड़-रगड़ कर निकालना है; ईर्ष्या, द्वेष,
जलन, मनमुटाव, कलह, अहम, स्वाभिमान और न जाने कौन-कौन से छोटे-बड़े
दैत्य अन्दर जगह-जगह डट कर बैठे हैं उन सब को खदेड़ने के काम में दिन-रात जुटना
है। क्या काम आसान है? क्या आप सारी झाड़ू एक झटके में लगा
देंगे? नहीं, बिलकुल नहीं। ज़रा-ज़रा
सी देर में उचक-उचक कर दूसरों पर नज़र डालेंगे और भटक जायेंगे अपने रास्ते से... 'अरे, कौन-कौन से दुर्गुण इसके अन्दर से झाँक रहे...'
बस, रास्ता भटकने के लिए इसका शतांश ही काफ़ी
है। तो मत भटकिये तंग गलियों में, दूसरों को उनकी सँकरी
गलियों से निकालने का काम भगवान् ने आपके ज़िम्मे तो नहीं किया है। यह प्रभु समय से
खुद उन्हें शिक्षा देंगे। आपने जब अपना राजपथ चुन लिया है तो औरों की सँकरी गलियों
में क्यों झाँके?
तो
चलें,
अपने-आपको साक्षी बना कर, अपने-आपसे वादा कर,
इंच-इंच कर, अपने अन्दर की झाड़-पोंछ में तल्लीन
हो जायें हम, तन-मन साफ़ तो दृष्टि भी स्वच्छ स्पष्ट और तब
हर एक कह सकेगा - बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय...”
और
मैं खुद को आईने में देखने लगा। मेरे अंदर से क्या झांक रहा है? अहम? नहीं। अहसान? नहीं।
श्रेष्ठता? नहीं। प्रसन्नता? हाँ, यह तो है, लेकिन प्रसन्नता में तो कालिमा नहीं है, लेकिन कहीं प्रसन्नता में तो छुपी हुई नहीं है?
किसी के काम आने का अहसास, अहम? कालिमा
कुछ देने की प्रसन्नता में छुपी हो सकती है! मैं कौन हूँ देने वाला, यह तो दिव्य ने पहले से पूरी व्यवस्था–रचना कर रखी थी, मैं तो सिर्फ निमित्त बना था। तो क्या निमित्त बनने की प्रसन्नता थी?
बार-बार अपने अंदर झाँकिए, देखते रहिए कहीं किसी कोने में, किसी के ओट में तो कहीं
कालिमा छुपी नहीं है? हमेशा अच्छे बने रहें, तो हमेशा
शांत बने रहेंगे।
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