शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

मनुर्भव

 



          कुछ वर्ष पुरानी बात है, बेटे के स्कूल समाप्त होने बाद परिवार में सब के मन में एक ही सवाल था - अब आगे क्या? डॉक्टरी, इंजीनियरिंग, बैकिंग, वकालत या कुछ और? लेकिन उसके जवाब से सब हतप्रभ रह गए। वह कार्पेंटर यानि बढ़ई बनना चाहता था। सब चुप रह गए, किसी के मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला।

याद आया उसका मन कभी भी तथाकथित पाठ्यक्रम में नहीं लगा। माँ-बाप हर समय उसके पीछे लगे रहते, परिणाम स्वरूप उसने अच्छे नंबरों से स्कूल की पढ़ाई पूरी की। उसका दाखिला एक प्रतिष्ठित कॉलेज में करा दिया। लेकिन कॉलेज से उसकी निरंतर शिकायतें आती रहतीं। आखिर एक दिन कॉलेज के प्रिंसपल का बुलावा आ ही गया। अभिभावक सकपकाते हुए उसके दफ्तर में घुसे। उन्होंने कहा “आप अपने बच्चे का भविष्य बिगाड़ने में क्यों लगे हैं?...” इसके पहले कि वे कुछ कहते उन्होंने आगे जोड़ा, “...अपने सपनों को उस पर लाद कर! उसे वह बनने दीजिये जो वह बनना चाहता है, उसका सहयोग कीजिये, विरोध नहीं।”

          वहाँ फिर क्या हुआ, इसे छोड़ हम चलते हैं अपने मुख्य विषय पर। हम अपने बच्चे पर अपने सपने क्यों लादना चाहते हैं? यह हमें स्वीकार करना होगा कि ऐसी सोच का कारण है कि हम अपने बच्चों को “नोट छापने की मशीन” बनाना चाहते हैं और इसलिए हमारी शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य यही हो गया है। पैसा हर एक को चाहिए। हाँ, यह सही है कि पैसा जीवन में एक बड़ी चीज़ है। पर, जब पैसा सबसे बड़ी चीज़ बन जाता है तो वह जीवन के प्रति हमारी दृष्टि को सर्वथा दूषित कर देता है, जिसका प्रभाव स्वभावतः शिक्षा पर पड़ता है।

          कॉलेज को, छोड़िए नर्सरी की उम्र के बच्चों के “अच्छे” विद्यालयों में प्रवेश के लिए माता-पिता कितनी दौड़-धूप और खर्च करते हैं? केवल कुछ बच्चों को दाखिला मिलता है और बाकी बच्चे जीवन की दौड़ शुरू होने से पहले ही हारे हुए घोषित कर दिए जाते हैं। इसका बच्चों पर कितना घातक प्रभाव पड़ता है इस पर हमारा ध्यान नहीं जाता।

          यह चिन्ता स्वाभाविक है कि शिक्षा के नाम पर हमारे बच्चे जानकारी हासिल कर लेते हैं पर मनुष्य के रूप में, और समाज के उपयोगी सदस्य के रूप में जीवन बिताने के लिए आवश्यक चारित्रिक गुण उनमें नहीं आते। पर इस कमी को दूर करने का उपाय यह भी नहीं है कि चारित्रिक गुणों की परीक्षा या मूल्यांकन का विषय बना दिया जाए। इसका मूल्यांकन परीक्षा द्वारा नहीं किया जा सकता।

          धर्म में भी ऐसा ही होता है। कौन कितना धार्मिक है यह सतही तौर पर देखने का पैमाना बनाया जा सकता है। कौन कितनी बार नमाज़ पढ़ता है, कितनी बार मंदिर जाता है, कितने लोगों को अपने धर्म में दीक्षित करता है, कौन कितना दान देता है आदि बातों को देखकर धार्मिकता का प्रमाणपत्र दिया जा सकता है। पर धर्म को सही अर्थ में समझने वाले लोग जानते हैं कि इन बातों का सच्ची धार्मिक भावना से दूर का भी संबंध नहीं है। वास्तव में धर्म के संबंध में किसी भी चीज़ को बाहरी पैमाने से नहीं नापा जा सकता।

          बिल्कुल यही बात शिक्षा पर लागू होती है। जिसे नापा जा सकता है वह असली शिक्षा नहीं है क्योंकि असली शिक्षा को नापा नहीं जा सकता । आज कि शिक्षा जानकारी हो सकती है, दिखावा हो सकती है, पर सच्ची शिक्षा नहीं। आइन्स्टाइन ने कहा था, "जो कुछ हमने विद्यालय में सीखा था उसे भूल जाने के बाद हमारे अंदर जो शेष रहता है वह शिक्षा है।" सच्ची शिक्षा मनुष्य के अंदर परिवर्तन लाती है जिसे अनुभव किया जा सकता है मापा नहीं जा सकता।

          परीक्षा में वे सवाल पूछे जाते हैं जिनका उत्तर तय हो, और विद्यार्थी परीक्षा-पुस्तिका में वहीं लिखते हैं जो उसके परीक्षक को पसन्द हो। विद्यार्थी को अपनी डिग्री मिल जाती है, अध्यापक को अपना वेतन, शिक्षा से दोनों ही वंचित रहते हैं।

          चारित्रिक गुणों के आकलन को परीक्षा से दूर रखा जाए और इनके विकास के लिए सतत प्रयास होना चाहिए। पर हमें यह मानकर चलना होगा कि चारित्रिक गुणों का आकलन करने की विधि का विकास करने में आजतक किसी भी शिक्षाशास्त्री, दार्शनिक या धार्मिक नेता को सफलता नहीं मिली है। चारित्रिक गुण बहुत कुछ परिवार, समाज, धर्म आदि से आते हैं। विद्यालय, इनके विकास के लिए अधिकाधिक प्रयास कर सकता है पर उस विकास में निश्चित सफलता का दावा कभी नहीं कर सकता।

          तब क्या किया जाए? फिलहाल अभी इसका एक ही उपाय नजर आता है, इसका उत्तरदायित्व बच्चों के अभिभावक, आस-पड़ोस और समाज उठाए और सब मिलकर उसमें सहयोग करें। अभिभावक और समाज इस बात को समझें और इस महत कार्य को अपना समय दें तथा ट्यूटर या विद्यालय पर बच्चों को न छोड़ें। इस बात के प्रति आशावान रहें कि एक समय ऐसा आयेगा शिक्षा शास्त्री इसका हल ढूंढ निकलेंगे। धीरे-धीरे अनेक आश्रमों, आध्यात्मिक गुरुओं ने ऐसे विद्यालयों की स्थापना की है जहां अन्य विद्यालयों के पाठ्यक्रम के अलावा “मनुर्भव, “मानव” बनने की भी शिक्षा दी जाती है।

          उदाहरण के लिए देश भर में फैले सीबीएसई (CBSE) स्कूल हैं, जो अकादमिक उत्कृष्टता के साथ-साथ बच्चों के मानसिक, शारीरिक, भावनात्मक, नैतिक  और आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा देते हैं-

          1। आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के संस्थापक गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर द्वारा स्थापित

          2। श्री अरविंद आश्रम द्वारा संचालित विद्यालय

          3। चिन्मय मिशन द्वारा संचालित विद्यालय  

          ऐसे विद्यालयों की संख्या भी धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है और जनता में इनके प्रति  आकर्षण है। हो सकता है वे ही इसका कोई समाधान तैयार कर सकें।

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बुधवार, 21 जनवरी 2026

जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि

  


एक व्यक्ति के पास कुछ प्यारे-प्यारे पिल्ले थे। उसकी इच्छा थी कि कोई उन्हें ले जाए और उनकी अच्छी तरह से देखभाल करे। पास-पड़ोसियों से पूछ आया लेकिन कोई लेना नहीं चाहता था। आख़ीर उसने घर के सामने चलती सड़क के किनारे के खम्भे पर यह सूचना बड़े-बड़े अक्षरों में टाँग दी-

"बच्चा, बूढ़ा, जवान, मर्द, औरत- जो चाहे मेरे यहाँ से छोटे-छोटे, सुन्दर पिल्ले ले जा सकता है-बिलकुल मुफ़्त!"

अपने सूचना-पट्ट की अन्तिम कील ठोंकने के साथ-साथ उसे कुछ महसूस हुआ। नीचे झुक कर देखा, पाँच-छह साल का एक बच्चा उसकी कमीज़ का सिरा हाथ से खींच रहा था-

"सर", बच्चा बोला, "मैं आपका एक पिल्ला लेना चाहता हूँ।"

उसने मुसकुराते हुए उसे देखा, "ठीक है मेरे प्यारे बच्चे, एक नज़र मेरे सभी पिल्लों पर डाल लो; फिर एक क्यों, दो ले जाओ।" इतना कह कर उस व्यक्ति ने सीटी बजायी नहीं कि बगीचे के दूसरे छोर से चार गेंद-जैसे गोल-मटोल पिल्ले दौड़ते-भागते, लुढ़कते-पुढ़कते आते दिखायी दिये। बच्चे की आँखों में ख़ुशी दौड़ गयी। लेकिन यह क्या? आखिर में एक नन्हीं गेंद और प्रकट हो गयी! औरों से ज़्यादा छोटा वह पिल्ला भागता-लँगड़ाता-सा दूसरों को पकड़ने की कोशिश में लगा था।

अचानक बच्चा ख़ुशी से उछल पड़ा। अन्तिम पिल्ले की तरफ़ इशारा कर बोला- "जी, मुझे वह नाटा पिल्ला चाहिये। मैं वही लूँगा।" वह ताली बजाने लगा। वह व्यक्ति घुटनों के बल बच्चे के सामने बैठ, उसका हाथ पकड़ कर बोला- "बेटे, तुम इसे लेना चाहोगे? इसका एक पैर ठीक नहीं है, तभी तो लँगड़ाता है। यह कभी भी तुम्हारे साथ उस तरह नहीं खेल पायेगा, दौड़ नहीं पायेगा जिस तरह ये चारों कर पायेंगे। इनमें से चुनो बच्चे, उसको तो मैं ही पाल लूँगा।"

          वह बालक दो क़दम पीछे हटा, नीचे झुक कर उसने दाहिनी पैंट की मोहरी घुटने तक उठा दी। वह व्यक्ति हक्का-बक्का रह गया। घुटने के नीचे का उसका पैर नक़ली था जो स्टील के 'ब्रेस' के सहारे उसके विशेष जूते से बँधा था।

          "सर, देखिये, मैं ख़ुद भी न उस तरह खेल सकता हूँ, न दौड़ सकता हूँ जिस तरह मेरे दूसरे दोस्त सरपट भागते हैं। आपके दूसरे पिल्लों को तो मेरे दूसरे कई दोस्त मिल जायेंगे, लेकिन इस नाटे को किसी मेरे जैसे की ही ज़रूरत है जो इसके दिल को पढ़ सके।"

          बच्चे के ललाट को चूमते हुए उसने कहा- "बेटे, भगवान् का रूप लेकर आये हो तुम इसके लिए, और इसने भी शायद तुम्हारे ही लिए इस धरती पर आँखें खोली हैं। मैं बहुत खुश हूँ कि मेरे इस नन्हें को तुम्हारे जैसा एक नन्हा, सच्चा साथी मिल गया है।"

          अपने नाटे पिल्ले को ख़ुशी-खुशी बच्चे के हाथ में थमाते हुए उस व्यक्ति ने एक बार फिर दोनों को बाहों में समेट लिया और उनके ललाट चूम लिये।

 

         जब आप की नजर किसी पर आत्म-भाव से पड़ती है तब उसका स्वरूप बदल जाता है।

         

          'पूज कर देव देखो।'- मूर्ति की पूजा कर फिर उसे देखोगे, तो देव दिखेंगे।

          'बीज बोकर खेत देखो'- बिना बीज बोये खेत पर जाओगे को वहाँ घास ही दिखायी देगी।

          पवित्र भावना की चादर ओढ़ कर संसार की ओर देखो, तो वह परम पवित्र दिखायी देगी

          माँ बच्चे को प्रेम से सजाती है, सुंदर वस्त्र पहनाती है, काजल का टीका लगती है, तो वह सुन्दर दिखायी देता है।

          इस तरह आत्म-भावना से विश्व को सजाओ, चमकाओ, मण्डित करो, आच्छादित करो और फिर देखो,

         आत्मीयता के कारण वह सुन्दर और प्रिय दिखादेगा।

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रविवार, 21 दिसंबर 2025

फूल औ काँटे

   


          ऐन ऑफिस के समय लगातार एक-के-बाद एक दो ट्रेन के रद्द, (कैंसिल) हो जाने के कारण मेट्रो स्टेशन पर भयंकर भीड़ थी। इस कारण हर आने वाली ट्रेन पहले से ही ठसा-ठस भरी हुई आ रही थी। उनमें चढ़ना और उतरना भी एक युद्ध के समान ही था। सब चढ़ने वाले  पहले चढ़ना चाहते थे लेकिन उधर उतरने वालों को पहले उतरना था। इस जद्दोजहद में कोई किसी को स्थान नहीं दे रहा था। लेकिन फिर भी भरी हुई ट्रेन में भी अनेक लोग जगह बना ही लेते थे, और चढ़ने वाले हर एक को ऐसा लगता था कि उसने कोई किला फतह कर लिया हो। इसी रेलम-पेल में मेट्रो ट्रेन आकर स्टेशन पर रुकी और चढ़ने-उतरने वालों की बीच युद्ध छिड़ गया। कुछ लोग उतरने की कोशिश कर रहे थे लेकिन उसके चौगुने लोग चढ़ने की। उन उतरने वाले लोगों के बीच एक बच्ची भी थी 20-21 वर्ष की। वह उतरने की बहुत कोशिश कर रही थी लेकिन इतनी भीड़ अंदर आ रही थी कि वह किसी भी प्रकार आगे नहीं बढ़ रही थी। उसने लोगों से उतरने के लिए जगह देने की लिए बार-बार अनुनय-विनय किया लेकिन कोई सुन ही नहीं रहा था, सब चढ़ने की जल्दी और धुन में थे। जो सुन भी रहे थे वे बेबस थे, उन्हें भी भीड़ आगे और पीछे से धकेल रही थी। उसे रोना छूट गया उसके आंखों से आंसू निकलने लगे। उस लड़की के पास खड़ी युवती को बच्ची पर दया भी आई और चढ़ती भीड़ पर क्रोध भी। वह सब चढ़ने वालों पर जोर-जोर से चिल्लाने लगी और किसी प्रकार से उन्हें धकेल कर बच्ची के उतरने का रास्ता बना दिया। बच्ची उतर गई और ट्रेन चल पड़ी।

          ट्रेन चलने कुछ ही देर बाद एक यात्री ने खीजते हुए कहा, कैसी लड़की थी, कैसे पैर मार कर गई है।” यह बात उसने इस युवती से कही जिसकी सहायता से बच्ची ट्रेन से उतर सकी  थी। युवती ने धीरे से कहा कि हो सकता है उसका पैर लग गया हो लेकिन जिस प्रकार की भीड़ थी उसने मारा नहीं होगा, पैर लग गया होगा।  

          नहीं हो ही नहीं सकता, उसने एकदम मारा है मेरे को,” उसने क्रोध में कहा।

          अच्छा ठीक है कोई बात नहीं मैं उसकी तरफ से माफी मांगती हूं, गलती हो गई माफ करें।”

          एक बार तो वह चुप हो गया लेकिन उसका अहम शांत नहीं हुआ, “एक तो मेरे को मार गई और आप उसी का पक्ष ले रही हैं। आपकी बहन थी इसीलिए न?”, उसने उसी प्रकार क्रोध से पूछा।

          “वह तो अब है नहीं, मैं उसके बदले आपसे माफी मांग रही हूँ, अब तो आप शांत हो जाइए।”

          “कौन थी वह आपकी लड़की, बहन?, उसने अपना प्रश्न फिर से दोहरा दिया।

          जैसे आप भाई हैं वैसे ही वह बहन थी”, युवती ने धीरे से कहा।

          नहीं, मैं तो आपको नहीं जानता हूं।”

          “लेकिन मैं भी उसे नहीं जानती।”

          उसका मुंह आश्चर्य से खुला रहा गया और शांत होकर चुप हो गया।

          कुछ देर बाद जब युवती उतरने के लिए आगे बढ़ने लगी, उसने कहा ठहरिए मैं आपके लिए जगह बना देता हूँ और सब को ठेल-ठेल कर उसने युवती के उतरने का रास्ता बना दिया।

          याद रखें इन्सानियत, इंसान पैदा करती है और हैवानियत, हैवान। आप जगत में जैसा बदलाव चाहते हैं, खुद में वैसा बदलाव लाएँ।

संत कबीरदास ने कहा है -

"जो तोको कांटा बोए, ताहि बोय तू फूल।

तोको फूल को फूल है, वाको है त्रिशूल।"

          बबूल के बदले बबूल? जगत को बबूल का जंगल बना देगी।

          बबूल के बदले फूल? जगत को फूलों की बगिया बना देगी।  

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शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

कायरता, वीरता या बहादुरी

 

          यह क्या हो गया हमें, हमें समझना चाहिए और धैर्य से काम लेना चाहिए। कानून को अपने हाथ में लेकर कानून की ताकत और प्रशासन के हाथों को कमजोर नहीं करना चाहिए। हमें वही करना चाहिए जो हम देखते आए हैं। अपने बच्चों को भी वही सिखाना है ताकि यह परंपरा कायम रहे, और हम सुरक्षित रहें। हमें पड़ोसियों और अंजान व्यक्तियों को बचाने के लिए अपने-आप को जोखिम में नहीं डालना चाहिए। हमें उनसे क्या मतलब, यहाँ यह भूल जाना चाहिए कि हम भी किसी के पड़ोसी हैं। ऐसे काम पुलिस के भरोसे ही छोड़ना चाहिए भले ही हम यह जानते हों कि पुलिस कुछ नहीं करेगी।  हाँ, हाथ पर हाथ धरे रखने से भी कुछ नहीं होगा। अतः हमें तो बस शांति से आंदोलन करना, सभा करना, जुलूस निकालना, बस यहीं  तक ही अपने को सीमित रखना चाहिए। बहुत हुआ सामाजिक संस्थाओं में, कॉलोनी और कॉम्प्लेक्स में सभा कर प्रस्ताव पारित करना चाहिए और नजदीक के थाने में उसकी एक प्रति भेजनी चाहिए।

          अभी कुछ दिन पहले अखबार में एक खबर पढ़ी जिसके सदमे से मैं अभी तक उबर नहीं पाया हूँ। दिल्ली के अखबार में एक खबर छपी। जिसका मजमून कुछ इस प्रकार का था -  

          दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके में श्वेता शर्मा ने मोटर साइकिल के सवार को, जिसने उसकी सोने की चेन छीनने की कोशिश की, बहादुरी से धक्का दे कर गिरा दिया। और त्रासदी देखिये, आस-पास खड़े लोगों ने भी उसे पकड़ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया।  इसी प्रकार दीपक दुआ ने रात 10.30 बजे मोडेल टाउन में एक 6 वर्ष की बच्ची को, एक संदिग्ध व्यक्ति द्वारा, अपहरण होने से बचा लिया। अवंतिका मित्तल ने देखा कि एक गाड़ी ने धक्का मार कर किसी राहगीर को बुरी तरह आहत कर दिया है उसने तुरंत एम्ब्युलेन्स को फोन किया, और धैर्य न रखते हुए एम्ब्युलेन्स के आने में देरी होते देख अवंतिका ने अपनी गाड़ी से,  पुलिस की कार्यवाही की चिंता न करते हुए उसे अस्पताल पहुंचाया। आस-पास खड़े लोगों ने समझ से काम लेते हुए उसका साथ नहीं दिया।  इनके अलावा तोशान्त मिलिंद ने जनकपुरी में फोन छीन कर भागते आदमी को पकड़ा। इसी प्रकार छोटे लाल, ऋषि कुमार, मनोज कुमार, रानी तामाङ, विनय सिंह सजवान, सुब्रता समानता, सुभम कुमार, उमेश कुमार आदि की भी ऐसी ही घटनाएँ हैं।

          यह तो एक शहर की ही है। अगर देश भर की ऐसी खबरें इकट्ठी की जाएँ तो अंदाज़ लगाएँ कितनी घटनाएँ जमा हो जाएंगी?

          दशकों पहले जब एक समुदाय के मुट्ठी भर लोग दूसरे समुदाय के मोहल्ले में जाकर तोड़-फोड़, आगजनी और लूट-पाट कर रहे थे, यही नहीं घरों में घुस कर महिलाओं को खींच-खींच कर सड़क पर लाकर उन्हें सरेआम जलील कर रहे थे और जाते समय कइयों को उठा कर भी ले गए तो तब भी हमलोग प्रतिवाद करने की हिम्मत नहीं कर सके। पुलिस और बाहरी सहायता का मुंह जोहते रहे। बाद में जब एक अहिंसा के पुजारी को इसकी खबर मिली तो दूसरे दिन उसने अपने अखबार में छापा कि अहिंसा को अपनाने के बजाय अगर वे आक्रमणकारियों को पकड़ कर वहीं मार डालते तो उन्हें ज्यादा खुशी होती।  पुजारी के साथियों ने इस खबर के लिए उनकी निंदा की और अपने इस सुझाव को वापस लेने का अनुरोध किया क्योंकि इससे दंगा भड़काने की गुंजाइश थी। लेकिन उन्होंने दूसरे दिन अपने साथियों की मुलाक़ात की चर्चा करते हुए फिर से छापा कि

वे अपने फैसले पर अडिग हैं। अहिंसा बहादुरों का हथियार है, बुज़दिलों का नहीं। ऐसी अवस्था में मैं हिंसा को अपना समर्थन दूँगा। यह अहिंसा नहीं कायरता है। वह कौम जो अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकती उसका यही हाल होना है। जो कौम कायर होती है उसका नमो निशान मिट जाता है

          कथा तो पूरी हो गई, लेकिन इसका सार क्या निकला?

अहिंसा के आवरण में अपनी कायरता को ढँकना? या, बहादुरों के रूप में सामना करना और अहिंसा की खुशबू फैलाना?

          आप क्या पसंद करेंगे? चुनाव आपको करना है।

          बहादुरों के रूप में अहिंसा की खुशबू फैलाना अच्छा है, लेकिन अत्याचार को सहने  वाला अत्याचार करने वाले से बड़ा दोषी है। अत्याचार कभी न सहें। 

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मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

आओ दीपक जलाएं

 दीपावली की शुभ कामनाओं के साथ आपको आमंत्रण है


          बहुत पुरानी बात है, वही अंधेरे वाली बात जिसमें कहा गया था कि दिवाली की रात में सब तरफ दीये जल रहे हैं, तुम भी एक दिया जलाओ। मैं हाथ में दीया लिए खड़ा था, लेकिन कहीं रखने की जगह नहीं थी। फिर ध्यान आया, हृदय के भीतर कहीं अंधेरा है, वहां उजाला करना बाकी है। वहीं रखता हूं अपने हाथ का दीया...

          आज सोच रहा हूं उस दिन परेशानी अंधेरा मिटाने की थी या उजाला करने की? क्या ज़्यादा महत्वपूर्ण था तब, अंधेरा मिटाना या उजाला करना? अंधेरा हटेगा तभी तो उजाला होगा। अर्थात अंधेरा हटे बिना उजाला नहीं हो सकता और उजाला होगा तो अंधेरा हटेगा ही।

          बात एक ही है, फिर भी अंतर है दोनों में। अंधेरा हटाने का मतलब गलत को सही करना और उजाला करने का मतलब सही को समझना, स्वीकारना। यह समझ या स्वीकार तभी सम्भव हो पाता है जब हम बाहर के उजाले के साथ-साथ भीतर कहीं उजाला करने की आवश्यकता को भी महसूस करें। जब भीतर उजाला करने की बात हो तो आवश्यकता उस सकारात्मकता की होती है जो जीवन में सार्थकता का अहसास कराती है। प्रकाश का अभाव अंधेरा नहीं है। अंधेरा वह अवस्था है जब हमें कुछ सूझता नहीं है। जब हम सही और उचित के पक्ष में खड़े नहीं हो पाते। जब हम गलत को गलत कहने से डरते हैं। असहाय बन कर अनुचित को स्वीकार कर लेते हैं, सह लेते हैं। घोर अंधेरे की अवस्था है यह।

          अब, जब घोर अंधेरा है तब दीपक रखने की जगह क्यों नहीं हैं? है, लेकिन दिख नहीं रही।

एक बार वैदिक काल से अब तक के भारतीय चिंतन के इतिहास पर दृष्टि डालें तब यह विदित होगा कि यहाँ विचारधाराओं का विकास उन के द्वारा किया गया है जिन्होंने अपने जीवन में साधना का और दूसरों की स्वार्थ रहित सहायता का मार्ग अपनाया था। समाज, देश और संसार की समस्याओं को सुलझाने के लिये हमारे इर्द-गिर्द विचारों और सुझावों का अंबार लगा है। लेकिन फिर भी समस्याएं सुलझने के बदले बढ़ती ही जा रही हैं क्योंकि उनमें प्रायः ही अहंकार, पक्षपात, अज्ञान और स्वार्थ किसी-न-किसी रूप में छिपा रहता है।

          अतः आपको अपने संकुचित दृष्टि और उसके पूर्वाग्रहों से मुक्त होने का प्रयास करना होगा।  इसका सबसे सरल उपाय है कि अपनी आय का एक प्रतिशत समाज को दें, समय का भी एक प्रतिशत। धन देना आसान है लेकिन समय नहीं। अगर समय नहीं देते तब, दिये हुए धन का सदुपयोग नहीं होता, दुराचारी के हाथ में पड़ कर दुरुपयोग ही होता है। अनेक, अपने समय की प्रतिष्ठित, समाजसेवी संस्थाएं बर्बाद हो गईं हैं। अथर्ववेद में कहा गया है शतहस्त समाहर, सहस्रहस्त संकिरसौ हाथों से जोड़ो और हज़ार हाथों से बिखेरो। एक प्रतिशत, यानि सप्ताह में लगभग दो घंटे। इतना समय और कुछ पैसे लेकर आप समान विचार वाले  कुछ मित्रों के साथ घर से बाहर निकलकर देखिए। आपको अपने आप दिखने लगेगा कि समाज में क्या-क्या किया जा सकता है, दीपक कहाँ रखा जा सकता है।

          यदि आप किसी भी पेशे यथा स्वास्थ्य, कानून, तकनीक, हिसाब-किताब आदि से जुड़े हैं तब तो आपके पास अथाह संभावनाएं हैं।  याद रखें दीपक रखने के लिए केवल गरीब का झोपड़ा नहीं हैं। वंचित, असहाय, लाचार, परेशान लोगों के पास भी दीपक रखने की जगह मिल जाएगी। धनवानों की चमकती कोठियों के इर्द-गिर्द भी घोर अंधेरा है।

          पड़ोस में वाचनालय (library) प्रांरभ करना, बेकार पड़ीं फटती पुस्तकों को उसके पाठकों तक पहुंचाना, निःशुल्क विद्या-दान देना, किसी गरीब, असहाय बुजुर्ग  की इलाज के लिए उसे हॉस्पिटल, डॉक्टर, परीक्षण केंद्र  तक ले जाने और लाना ... कहीं से एक कोना पकड़िये  और फिर ... काम बहुत हैं। लेकिन केवल तभी संभव है जब स्वार्थ रहित होकर काम कर रहे होंगे। आप समझेंगे कि आपका जीवन एक विशालतम चेतना के महासागर में एक लहर मात्र है। वास्तव में सतही जीवन की दौड़‌-भाग में लगे हुए व्यक्ति के अंदर जीवन को समझने के लिये  अवकाश नहीं होता। बाधा हर काम में है, लेकिन उसका हल भी है।

          और जब समाज के लिए कुछ करें तो किसी-पर-किसी भी प्रकार के अहसान की भावना से नहीं, वैसा करने से आप एक सीमित क्षुद्र दृष्टि से घिर जाएँगे। उस काम को अपनी वैयक्तिक साधना के रूप में लीजिए। मानो विश्व एक आश्रम हो और वहाँ आपको साधना करने का काम दिया गया है

          आप एक प्रतिशत से प्रारंभ कीजिए। धीरे-धीरे आप पायेंगे कि आप समाज के लिये और अधिक करना चाहते हैं क्योंकि केवल वही काम, जो आप दूसरों के लिए करते हैं, आपको वह सब देगा जिसके लिए आप अपनी जिंदगी खपाते रहते हैं - सच्चा सुख, शांति और आत्मिक प्रसन्नता।

          आप यह समझ नहीं पाएंगे कि अपने हाथ के दीपक को कहाँ-कहाँ रखूँ? जगह नहीं,  दीपक कम पड़ जाएंगे।

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रविवार, 21 सितंबर 2025

हम कहाँ खड़े हैं?


          

हम भारतीय बिना जाने समझे अपने आप पर बहुत गर्व करते हैं, अभिमान और घमंड की हद तक। न हमने विश्व भ्रमण किया और न ही हम कुछ पढ़े, व्हाट्सअप्प-फेसबूक आदि के अलावा। हाँ यह सही है कि अनेक बातों में, रहन-सहन में, सोच-विचार में हमारी श्रेष्ठता है, लेकिन उसे बनाए रखना और उसे नित नई ऊंचाइयों पर पहुंचाना  हमारा ही उत्तरदायित्व है। हम “सनातन” कहने और जानने से नहीं बल्कि वैसा होने से हैं। पॉण्डिचेरी की श्री माँ ने कहा भी है –

                              जानना अच्छा है,

                                        समझना बेहतर है,

                                                  लेकिन होना सर्वोत्तम है। 

दुनिया बड़ी तेजी से प्रगति कर रही है और हम उसके साथ कदम मिला कर नहीं चल रहे हैं।  मैथिली शरण गुप्त ने दशकों पहले लिखा था –

हम कौन थे, क्या हो गए हैं, और क्या होंगे अभी

आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएँ सभी।

          हिन्दी के साहित्यकार विष्णु प्रभाकर ने दुनिया का सफर किया, हिंदुस्तान में भी अनेक विदेशियों के संपर्क में रहे। उनके संस्मरण चौंकने वाले हैं और एक नई खिड़की खोलते हैं। एक बार रूस की यात्रा के दौरान रूसी भाषा से अंजान उनका परिचय वहाँ की एक दुभाषिया वेरोनिका से हुआ और जल्द ही वे आपस में घुल-मिल गए। वे बताते हैं कि  एक दिन बातों-ही-बातों में चर्चा उसके परिवार पर पहुँच गई। उसने बताया कि उसके पिता द्वितीय महायुद्ध में मारे गए थे। माँ, भाई-बहनों का परिवार चलाती है, क्योंकि उन्होंने अभी शादी नहीं की।

          "आपकी माँ ने शादी नहीं की?" पूछने पर एक क्षण के लिए जैसे वह गंभीर हो उठी और बताया, "मेरी माँ मुझसे बहुत ज़्यादा सुंदर है। बहुत बुद्धिमान और चतुर है। उनके लिए दूसरा पति पाना बहुत आसान था, परंतु फिर भी उन्होंने शादी नहीं की।"

"लेकिन क्यों?" विष्णुजी की जिज्ञासा चरम सीमा पर पहुँच गई।

वह उसी गंभीरता से बोली,

"वे अपने लिए अच्छा पति पा सकती थीं, पर संतान के लिए अच्छा पिता पाना आसान नहीं है। हमारे लिए, उन्होंने अपने सुख का बलिदान कर दिया।"

          और कहते-कहते दुभाषिया वेरोनिका जैसे भीग गई। विष्णु प्रभाकर जी यह स्वीकार करते हैं कि क्षण-भर के लिए वे स्तब्ध रह गये। विदेशियों के जीवन को लेकर हम अभिमानी भारतवासी क्या नहीं कहते, कौन-सा लांछन नहीं लगाते, पर यह एक घटना क्या इस बात का प्रमाण नहीं है कि अपने दायित्व के लिए जीवन के बड़े-से-बड़े सुख का बलिदान करने में उनमें हिचकिचाहट नहीं है!

          हम भारतवासी अविवाहित माँ को सह ही नहीं सकते। भ्रूण-हत्या, गर्भपात, वेश्यावृत्ति-सब कुछ सह सकते हैं, पर 'माँ' अविवाहित भी हो सकती है, इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। लेकिन यह विदेशी महिला कह रही थी-

"हम अविवाहित माँ का अपमान करने की कल्पना नहीं कर सकते। उसने कौन-सा पाप किया है? क्या संतान पैदा करना गुनाह है? हमारे समाज में उसकी वही प्रतिष्ठा है, जो किसी भी कुलीन नारी की हो सकती है। उसकी संतान का वही सम्मान है, जो किसी विवाहित स्त्री-पुरुष की संतान का हो सकता है...।"

          हम में से बहुतों को यह पाप जान पड़ सकता है, पर किसका पाप? विदेशियों के लिए यह एक सहज प्रक्रिया है। इसपर बहस न करना ही उचित है। विष्णु प्रभाकर तो विदेशी नर-नारी की एक झलक भर देना चाहते हैं। उनकी सेवा-परायणता, उनका स्नेह, उनका देश-प्रेम, नारी के स्वाभिमान और अपने दायित्व के प्रति ममता और सब से ऊपर उसकी निर्बाध उन्मुक्तता; क्या ये नारी का परिचय नहीं देते? क्या ये गुण आज की नारी के लिए गर्व और गौरव का कारण नहीं हैं? भले ही वह नारी पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण-कहीं की भी हो।

          विचार करें, इसकी तुलना में हम कहाँ खड़े हैं?

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यूट्यूब  का संपर्क सूत्र :

https://youtu.be/FysuTyTz92U

मनुर्भव

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