बुधवार, 21 जनवरी 2026

जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि

  


एक व्यक्ति के पास कुछ प्यारे-प्यारे पिल्ले थे। उसकी इच्छा थी कि कोई उन्हें ले जाए और उनकी अच्छी तरह से देखभाल करे। पास-पड़ोसियों से पूछ आया लेकिन कोई लेना नहीं चाहता था। आख़ीर उसने घर के सामने चलती सड़क के किनारे के खम्भे पर यह सूचना बड़े-बड़े अक्षरों में टाँग दी-

"बच्चा, बूढ़ा, जवान, मर्द, औरत- जो चाहे मेरे यहाँ से छोटे-छोटे, सुन्दर पिल्ले ले जा सकता है-बिलकुल मुफ़्त!"

अपने सूचना-पट्ट की अन्तिम कील ठोंकने के साथ-साथ उसे कुछ महसूस हुआ। नीचे झुक कर देखा, पाँच-छह साल का एक बच्चा उसकी कमीज़ का सिरा हाथ से खींच रहा था-

"सर", बच्चा बोला, "मैं आपका एक पिल्ला लेना चाहता हूँ।"

उसने मुसकुराते हुए उसे देखा, "ठीक है मेरे प्यारे बच्चे, एक नज़र मेरे सभी पिल्लों पर डाल लो; फिर एक क्यों, दो ले जाओ।" इतना कह कर उस व्यक्ति ने सीटी बजायी नहीं कि बगीचे के दूसरे छोर से चार गेंद-जैसे गोल-मटोल पिल्ले दौड़ते-भागते, लुढ़कते-पुढ़कते आते दिखायी दिये। बच्चे की आँखों में ख़ुशी दौड़ गयी। लेकिन यह क्या? आखिर में एक नन्हीं गेंद और प्रकट हो गयी! औरों से ज़्यादा छोटा वह पिल्ला भागता-लँगड़ाता-सा दूसरों को पकड़ने की कोशिश में लगा था।

अचानक बच्चा ख़ुशी से उछल पड़ा। अन्तिम पिल्ले की तरफ़ इशारा कर बोला- "जी, मुझे वह नाटा पिल्ला चाहिये। मैं वही लूँगा।" वह ताली बजाने लगा। वह व्यक्ति घुटनों के बल बच्चे के सामने बैठ, उसका हाथ पकड़ कर बोला- "बेटे, तुम इसे लेना चाहोगे? इसका एक पैर ठीक नहीं है, तभी तो लँगड़ाता है। यह कभी भी तुम्हारे साथ उस तरह नहीं खेल पायेगा, दौड़ नहीं पायेगा जिस तरह ये चारों कर पायेंगे। इनमें से चुनो बच्चे, उसको तो मैं ही पाल लूँगा।"

          वह बालक दो क़दम पीछे हटा, नीचे झुक कर उसने दाहिनी पैंट की मोहरी घुटने तक उठा दी। वह व्यक्ति हक्का-बक्का रह गया। घुटने के नीचे का उसका पैर नक़ली था जो स्टील के 'ब्रेस' के सहारे उसके विशेष जूते से बँधा था।

          "सर, देखिये, मैं ख़ुद भी न उस तरह खेल सकता हूँ, न दौड़ सकता हूँ जिस तरह मेरे दूसरे दोस्त सरपट भागते हैं। आपके दूसरे पिल्लों को तो मेरे दूसरे कई दोस्त मिल जायेंगे, लेकिन इस नाटे को किसी मेरे जैसे की ही ज़रूरत है जो इसके दिल को पढ़ सके।"

          बच्चे के ललाट को चूमते हुए उसने कहा- "बेटे, भगवान् का रूप लेकर आये हो तुम इसके लिए, और इसने भी शायद तुम्हारे ही लिए इस धरती पर आँखें खोली हैं। मैं बहुत खुश हूँ कि मेरे इस नन्हें को तुम्हारे जैसा एक नन्हा, सच्चा साथी मिल गया है।"

          अपने नाटे पिल्ले को ख़ुशी-खुशी बच्चे के हाथ में थमाते हुए उस व्यक्ति ने एक बार फिर दोनों को बाहों में समेट लिया और उनके ललाट चूम लिये।

 

         जब आप की नजर किसी पर आत्म-भाव से पड़ती है तब उसका स्वरूप बदल जाता है।

         

          'पूज कर देव देखो।'- मूर्ति की पूजा कर फिर उसे देखोगे, तो देव दिखेंगे।

          'बीज बोकर खेत देखो'- बिना बीज बोये खेत पर जाओगे को वहाँ घास ही दिखायी देगी।

          पवित्र भावना की चादर ओढ़ कर संसार की ओर देखो, तो वह परम पवित्र दिखायी देगी

          माँ बच्चे को प्रेम से सजाती है, सुंदर वस्त्र पहनाती है, काजल का टीका लगती है, तो वह सुन्दर दिखायी देता है।

          इस तरह आत्म-भावना से विश्व को सजाओ, चमकाओ, मण्डित करो, आच्छादित करो और फिर देखो,

         आत्मीयता के कारण वह सुन्दर और प्रिय दिखादेगा।

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रविवार, 21 दिसंबर 2025

फूल औ काँटे

   


          ऐन ऑफिस के समय लगातार एक-के-बाद एक दो ट्रेन के रद्द, (कैंसिल) हो जाने के कारण मेट्रो स्टेशन पर भयंकर भीड़ थी। इस कारण हर आने वाली ट्रेन पहले से ही ठसा-ठस भरी हुई आ रही थी। उनमें चढ़ना और उतरना भी एक युद्ध के समान ही था। सब चढ़ने वाले  पहले चढ़ना चाहते थे लेकिन उधर उतरने वालों को पहले उतरना था। इस जद्दोजहद में कोई किसी को स्थान नहीं दे रहा था। लेकिन फिर भी भरी हुई ट्रेन में भी अनेक लोग जगह बना ही लेते थे, और चढ़ने वाले हर एक को ऐसा लगता था कि उसने कोई किला फतह कर लिया हो। इसी रेलम-पेल में मेट्रो ट्रेन आकर स्टेशन पर रुकी और चढ़ने-उतरने वालों की बीच युद्ध छिड़ गया। कुछ लोग उतरने की कोशिश कर रहे थे लेकिन उसके चौगुने लोग चढ़ने की। उन उतरने वाले लोगों के बीच एक बच्ची भी थी 20-21 वर्ष की। वह उतरने की बहुत कोशिश कर रही थी लेकिन इतनी भीड़ अंदर आ रही थी कि वह किसी भी प्रकार आगे नहीं बढ़ रही थी। उसने लोगों से उतरने के लिए जगह देने की लिए बार-बार अनुनय-विनय किया लेकिन कोई सुन ही नहीं रहा था, सब चढ़ने की जल्दी और धुन में थे। जो सुन भी रहे थे वे बेबस थे, उन्हें भी भीड़ आगे और पीछे से धकेल रही थी। उसे रोना छूट गया उसके आंखों से आंसू निकलने लगे। उस लड़की के पास खड़ी युवती को बच्ची पर दया भी आई और चढ़ती भीड़ पर क्रोध भी। वह सब चढ़ने वालों पर जोर-जोर से चिल्लाने लगी और किसी प्रकार से उन्हें धकेल कर बच्ची के उतरने का रास्ता बना दिया। बच्ची उतर गई और ट्रेन चल पड़ी।

          ट्रेन चलने कुछ ही देर बाद एक यात्री ने खीजते हुए कहा, कैसी लड़की थी, कैसे पैर मार कर गई है।” यह बात उसने इस युवती से कही जिसकी सहायता से बच्ची ट्रेन से उतर सकी  थी। युवती ने धीरे से कहा कि हो सकता है उसका पैर लग गया हो लेकिन जिस प्रकार की भीड़ थी उसने मारा नहीं होगा, पैर लग गया होगा।  

          नहीं हो ही नहीं सकता, उसने एकदम मारा है मेरे को,” उसने क्रोध में कहा।

          अच्छा ठीक है कोई बात नहीं मैं उसकी तरफ से माफी मांगती हूं, गलती हो गई माफ करें।”

          एक बार तो वह चुप हो गया लेकिन उसका अहम शांत नहीं हुआ, “एक तो मेरे को मार गई और आप उसी का पक्ष ले रही हैं। आपकी बहन थी इसीलिए न?”, उसने उसी प्रकार क्रोध से पूछा।

          “वह तो अब है नहीं, मैं उसके बदले आपसे माफी मांग रही हूँ, अब तो आप शांत हो जाइए।”

          “कौन थी वह आपकी लड़की, बहन?, उसने अपना प्रश्न फिर से दोहरा दिया।

          जैसे आप भाई हैं वैसे ही वह बहन थी”, युवती ने धीरे से कहा।

          नहीं, मैं तो आपको नहीं जानता हूं।”

          “लेकिन मैं भी उसे नहीं जानती।”

          उसका मुंह आश्चर्य से खुला रहा गया और शांत होकर चुप हो गया।

          कुछ देर बाद जब युवती उतरने के लिए आगे बढ़ने लगी, उसने कहा ठहरिए मैं आपके लिए जगह बना देता हूँ और सब को ठेल-ठेल कर उसने युवती के उतरने का रास्ता बना दिया।

          याद रखें इन्सानियत, इंसान पैदा करती है और हैवानियत, हैवान। आप जगत में जैसा बदलाव चाहते हैं, खुद में वैसा बदलाव लाएँ।

संत कबीरदास ने कहा है -

"जो तोको कांटा बोए, ताहि बोय तू फूल।

तोको फूल को फूल है, वाको है त्रिशूल।"

          बबूल के बदले बबूल? जगत को बबूल का जंगल बना देगी।

          बबूल के बदले फूल? जगत को फूलों की बगिया बना देगी।  

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शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

कायरता, वीरता या बहादुरी

 

          यह क्या हो गया हमें, हमें समझना चाहिए और धैर्य से काम लेना चाहिए। कानून को अपने हाथ में लेकर कानून की ताकत और प्रशासन के हाथों को कमजोर नहीं करना चाहिए। हमें वही करना चाहिए जो हम देखते आए हैं। अपने बच्चों को भी वही सिखाना है ताकि यह परंपरा कायम रहे, और हम सुरक्षित रहें। हमें पड़ोसियों और अंजान व्यक्तियों को बचाने के लिए अपने-आप को जोखिम में नहीं डालना चाहिए। हमें उनसे क्या मतलब, यहाँ यह भूल जाना चाहिए कि हम भी किसी के पड़ोसी हैं। ऐसे काम पुलिस के भरोसे ही छोड़ना चाहिए भले ही हम यह जानते हों कि पुलिस कुछ नहीं करेगी।  हाँ, हाथ पर हाथ धरे रखने से भी कुछ नहीं होगा। अतः हमें तो बस शांति से आंदोलन करना, सभा करना, जुलूस निकालना, बस यहीं  तक ही अपने को सीमित रखना चाहिए। बहुत हुआ सामाजिक संस्थाओं में, कॉलोनी और कॉम्प्लेक्स में सभा कर प्रस्ताव पारित करना चाहिए और नजदीक के थाने में उसकी एक प्रति भेजनी चाहिए।

          अभी कुछ दिन पहले अखबार में एक खबर पढ़ी जिसके सदमे से मैं अभी तक उबर नहीं पाया हूँ। दिल्ली के अखबार में एक खबर छपी। जिसका मजमून कुछ इस प्रकार का था -  

          दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके में श्वेता शर्मा ने मोटर साइकिल के सवार को, जिसने उसकी सोने की चेन छीनने की कोशिश की, बहादुरी से धक्का दे कर गिरा दिया। और त्रासदी देखिये, आस-पास खड़े लोगों ने भी उसे पकड़ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया।  इसी प्रकार दीपक दुआ ने रात 10.30 बजे मोडेल टाउन में एक 6 वर्ष की बच्ची को, एक संदिग्ध व्यक्ति द्वारा, अपहरण होने से बचा लिया। अवंतिका मित्तल ने देखा कि एक गाड़ी ने धक्का मार कर किसी राहगीर को बुरी तरह आहत कर दिया है उसने तुरंत एम्ब्युलेन्स को फोन किया, और धैर्य न रखते हुए एम्ब्युलेन्स के आने में देरी होते देख अवंतिका ने अपनी गाड़ी से,  पुलिस की कार्यवाही की चिंता न करते हुए उसे अस्पताल पहुंचाया। आस-पास खड़े लोगों ने समझ से काम लेते हुए उसका साथ नहीं दिया।  इनके अलावा तोशान्त मिलिंद ने जनकपुरी में फोन छीन कर भागते आदमी को पकड़ा। इसी प्रकार छोटे लाल, ऋषि कुमार, मनोज कुमार, रानी तामाङ, विनय सिंह सजवान, सुब्रता समानता, सुभम कुमार, उमेश कुमार आदि की भी ऐसी ही घटनाएँ हैं।

          यह तो एक शहर की ही है। अगर देश भर की ऐसी खबरें इकट्ठी की जाएँ तो अंदाज़ लगाएँ कितनी घटनाएँ जमा हो जाएंगी?

          दशकों पहले जब एक समुदाय के मुट्ठी भर लोग दूसरे समुदाय के मोहल्ले में जाकर तोड़-फोड़, आगजनी और लूट-पाट कर रहे थे, यही नहीं घरों में घुस कर महिलाओं को खींच-खींच कर सड़क पर लाकर उन्हें सरेआम जलील कर रहे थे और जाते समय कइयों को उठा कर भी ले गए तो तब भी हमलोग प्रतिवाद करने की हिम्मत नहीं कर सके। पुलिस और बाहरी सहायता का मुंह जोहते रहे। बाद में जब एक अहिंसा के पुजारी को इसकी खबर मिली तो दूसरे दिन उसने अपने अखबार में छापा कि अहिंसा को अपनाने के बजाय अगर वे आक्रमणकारियों को पकड़ कर वहीं मार डालते तो उन्हें ज्यादा खुशी होती।  पुजारी के साथियों ने इस खबर के लिए उनकी निंदा की और अपने इस सुझाव को वापस लेने का अनुरोध किया क्योंकि इससे दंगा भड़काने की गुंजाइश थी। लेकिन उन्होंने दूसरे दिन अपने साथियों की मुलाक़ात की चर्चा करते हुए फिर से छापा कि

वे अपने फैसले पर अडिग हैं। अहिंसा बहादुरों का हथियार है, बुज़दिलों का नहीं। ऐसी अवस्था में मैं हिंसा को अपना समर्थन दूँगा। यह अहिंसा नहीं कायरता है। वह कौम जो अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकती उसका यही हाल होना है। जो कौम कायर होती है उसका नमो निशान मिट जाता है

          कथा तो पूरी हो गई, लेकिन इसका सार क्या निकला?

अहिंसा के आवरण में अपनी कायरता को ढँकना? या, बहादुरों के रूप में सामना करना और अहिंसा की खुशबू फैलाना?

          आप क्या पसंद करेंगे? चुनाव आपको करना है।

          बहादुरों के रूप में अहिंसा की खुशबू फैलाना अच्छा है, लेकिन अत्याचार को सहने  वाला अत्याचार करने वाले से बड़ा दोषी है। अत्याचार कभी न सहें। 

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मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

आओ दीपक जलाएं

 दीपावली की शुभ कामनाओं के साथ आपको आमंत्रण है


          बहुत पुरानी बात है, वही अंधेरे वाली बात जिसमें कहा गया था कि दिवाली की रात में सब तरफ दीये जल रहे हैं, तुम भी एक दिया जलाओ। मैं हाथ में दीया लिए खड़ा था, लेकिन कहीं रखने की जगह नहीं थी। फिर ध्यान आया, हृदय के भीतर कहीं अंधेरा है, वहां उजाला करना बाकी है। वहीं रखता हूं अपने हाथ का दीया...

          आज सोच रहा हूं उस दिन परेशानी अंधेरा मिटाने की थी या उजाला करने की? क्या ज़्यादा महत्वपूर्ण था तब, अंधेरा मिटाना या उजाला करना? अंधेरा हटेगा तभी तो उजाला होगा। अर्थात अंधेरा हटे बिना उजाला नहीं हो सकता और उजाला होगा तो अंधेरा हटेगा ही।

          बात एक ही है, फिर भी अंतर है दोनों में। अंधेरा हटाने का मतलब गलत को सही करना और उजाला करने का मतलब सही को समझना, स्वीकारना। यह समझ या स्वीकार तभी सम्भव हो पाता है जब हम बाहर के उजाले के साथ-साथ भीतर कहीं उजाला करने की आवश्यकता को भी महसूस करें। जब भीतर उजाला करने की बात हो तो आवश्यकता उस सकारात्मकता की होती है जो जीवन में सार्थकता का अहसास कराती है। प्रकाश का अभाव अंधेरा नहीं है। अंधेरा वह अवस्था है जब हमें कुछ सूझता नहीं है। जब हम सही और उचित के पक्ष में खड़े नहीं हो पाते। जब हम गलत को गलत कहने से डरते हैं। असहाय बन कर अनुचित को स्वीकार कर लेते हैं, सह लेते हैं। घोर अंधेरे की अवस्था है यह।

          अब, जब घोर अंधेरा है तब दीपक रखने की जगह क्यों नहीं हैं? है, लेकिन दिख नहीं रही।

एक बार वैदिक काल से अब तक के भारतीय चिंतन के इतिहास पर दृष्टि डालें तब यह विदित होगा कि यहाँ विचारधाराओं का विकास उन के द्वारा किया गया है जिन्होंने अपने जीवन में साधना का और दूसरों की स्वार्थ रहित सहायता का मार्ग अपनाया था। समाज, देश और संसार की समस्याओं को सुलझाने के लिये हमारे इर्द-गिर्द विचारों और सुझावों का अंबार लगा है। लेकिन फिर भी समस्याएं सुलझने के बदले बढ़ती ही जा रही हैं क्योंकि उनमें प्रायः ही अहंकार, पक्षपात, अज्ञान और स्वार्थ किसी-न-किसी रूप में छिपा रहता है।

          अतः आपको अपने संकुचित दृष्टि और उसके पूर्वाग्रहों से मुक्त होने का प्रयास करना होगा।  इसका सबसे सरल उपाय है कि अपनी आय का एक प्रतिशत समाज को दें, समय का भी एक प्रतिशत। धन देना आसान है लेकिन समय नहीं। अगर समय नहीं देते तब, दिये हुए धन का सदुपयोग नहीं होता, दुराचारी के हाथ में पड़ कर दुरुपयोग ही होता है। अनेक, अपने समय की प्रतिष्ठित, समाजसेवी संस्थाएं बर्बाद हो गईं हैं। अथर्ववेद में कहा गया है शतहस्त समाहर, सहस्रहस्त संकिरसौ हाथों से जोड़ो और हज़ार हाथों से बिखेरो। एक प्रतिशत, यानि सप्ताह में लगभग दो घंटे। इतना समय और कुछ पैसे लेकर आप समान विचार वाले  कुछ मित्रों के साथ घर से बाहर निकलकर देखिए। आपको अपने आप दिखने लगेगा कि समाज में क्या-क्या किया जा सकता है, दीपक कहाँ रखा जा सकता है।

          यदि आप किसी भी पेशे यथा स्वास्थ्य, कानून, तकनीक, हिसाब-किताब आदि से जुड़े हैं तब तो आपके पास अथाह संभावनाएं हैं।  याद रखें दीपक रखने के लिए केवल गरीब का झोपड़ा नहीं हैं। वंचित, असहाय, लाचार, परेशान लोगों के पास भी दीपक रखने की जगह मिल जाएगी। धनवानों की चमकती कोठियों के इर्द-गिर्द भी घोर अंधेरा है।

          पड़ोस में वाचनालय (library) प्रांरभ करना, बेकार पड़ीं फटती पुस्तकों को उसके पाठकों तक पहुंचाना, निःशुल्क विद्या-दान देना, किसी गरीब, असहाय बुजुर्ग  की इलाज के लिए उसे हॉस्पिटल, डॉक्टर, परीक्षण केंद्र  तक ले जाने और लाना ... कहीं से एक कोना पकड़िये  और फिर ... काम बहुत हैं। लेकिन केवल तभी संभव है जब स्वार्थ रहित होकर काम कर रहे होंगे। आप समझेंगे कि आपका जीवन एक विशालतम चेतना के महासागर में एक लहर मात्र है। वास्तव में सतही जीवन की दौड़‌-भाग में लगे हुए व्यक्ति के अंदर जीवन को समझने के लिये  अवकाश नहीं होता। बाधा हर काम में है, लेकिन उसका हल भी है।

          और जब समाज के लिए कुछ करें तो किसी-पर-किसी भी प्रकार के अहसान की भावना से नहीं, वैसा करने से आप एक सीमित क्षुद्र दृष्टि से घिर जाएँगे। उस काम को अपनी वैयक्तिक साधना के रूप में लीजिए। मानो विश्व एक आश्रम हो और वहाँ आपको साधना करने का काम दिया गया है

          आप एक प्रतिशत से प्रारंभ कीजिए। धीरे-धीरे आप पायेंगे कि आप समाज के लिये और अधिक करना चाहते हैं क्योंकि केवल वही काम, जो आप दूसरों के लिए करते हैं, आपको वह सब देगा जिसके लिए आप अपनी जिंदगी खपाते रहते हैं - सच्चा सुख, शांति और आत्मिक प्रसन्नता।

          आप यह समझ नहीं पाएंगे कि अपने हाथ के दीपक को कहाँ-कहाँ रखूँ? जगह नहीं,  दीपक कम पड़ जाएंगे।

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रविवार, 21 सितंबर 2025

हम कहाँ खड़े हैं?


          

हम भारतीय बिना जाने समझे अपने आप पर बहुत गर्व करते हैं, अभिमान और घमंड की हद तक। न हमने विश्व भ्रमण किया और न ही हम कुछ पढ़े, व्हाट्सअप्प-फेसबूक आदि के अलावा। हाँ यह सही है कि अनेक बातों में, रहन-सहन में, सोच-विचार में हमारी श्रेष्ठता है, लेकिन उसे बनाए रखना और उसे नित नई ऊंचाइयों पर पहुंचाना  हमारा ही उत्तरदायित्व है। हम “सनातन” कहने और जानने से नहीं बल्कि वैसा होने से हैं। पॉण्डिचेरी की श्री माँ ने कहा भी है –

                              जानना अच्छा है,

                                        समझना बेहतर है,

                                                  लेकिन होना सर्वोत्तम है। 

दुनिया बड़ी तेजी से प्रगति कर रही है और हम उसके साथ कदम मिला कर नहीं चल रहे हैं।  मैथिली शरण गुप्त ने दशकों पहले लिखा था –

हम कौन थे, क्या हो गए हैं, और क्या होंगे अभी

आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएँ सभी।

          हिन्दी के साहित्यकार विष्णु प्रभाकर ने दुनिया का सफर किया, हिंदुस्तान में भी अनेक विदेशियों के संपर्क में रहे। उनके संस्मरण चौंकने वाले हैं और एक नई खिड़की खोलते हैं। एक बार रूस की यात्रा के दौरान रूसी भाषा से अंजान उनका परिचय वहाँ की एक दुभाषिया वेरोनिका से हुआ और जल्द ही वे आपस में घुल-मिल गए। वे बताते हैं कि  एक दिन बातों-ही-बातों में चर्चा उसके परिवार पर पहुँच गई। उसने बताया कि उसके पिता द्वितीय महायुद्ध में मारे गए थे। माँ, भाई-बहनों का परिवार चलाती है, क्योंकि उन्होंने अभी शादी नहीं की।

          "आपकी माँ ने शादी नहीं की?" पूछने पर एक क्षण के लिए जैसे वह गंभीर हो उठी और बताया, "मेरी माँ मुझसे बहुत ज़्यादा सुंदर है। बहुत बुद्धिमान और चतुर है। उनके लिए दूसरा पति पाना बहुत आसान था, परंतु फिर भी उन्होंने शादी नहीं की।"

"लेकिन क्यों?" विष्णुजी की जिज्ञासा चरम सीमा पर पहुँच गई।

वह उसी गंभीरता से बोली,

"वे अपने लिए अच्छा पति पा सकती थीं, पर संतान के लिए अच्छा पिता पाना आसान नहीं है। हमारे लिए, उन्होंने अपने सुख का बलिदान कर दिया।"

          और कहते-कहते दुभाषिया वेरोनिका जैसे भीग गई। विष्णु प्रभाकर जी यह स्वीकार करते हैं कि क्षण-भर के लिए वे स्तब्ध रह गये। विदेशियों के जीवन को लेकर हम अभिमानी भारतवासी क्या नहीं कहते, कौन-सा लांछन नहीं लगाते, पर यह एक घटना क्या इस बात का प्रमाण नहीं है कि अपने दायित्व के लिए जीवन के बड़े-से-बड़े सुख का बलिदान करने में उनमें हिचकिचाहट नहीं है!

          हम भारतवासी अविवाहित माँ को सह ही नहीं सकते। भ्रूण-हत्या, गर्भपात, वेश्यावृत्ति-सब कुछ सह सकते हैं, पर 'माँ' अविवाहित भी हो सकती है, इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। लेकिन यह विदेशी महिला कह रही थी-

"हम अविवाहित माँ का अपमान करने की कल्पना नहीं कर सकते। उसने कौन-सा पाप किया है? क्या संतान पैदा करना गुनाह है? हमारे समाज में उसकी वही प्रतिष्ठा है, जो किसी भी कुलीन नारी की हो सकती है। उसकी संतान का वही सम्मान है, जो किसी विवाहित स्त्री-पुरुष की संतान का हो सकता है...।"

          हम में से बहुतों को यह पाप जान पड़ सकता है, पर किसका पाप? विदेशियों के लिए यह एक सहज प्रक्रिया है। इसपर बहस न करना ही उचित है। विष्णु प्रभाकर तो विदेशी नर-नारी की एक झलक भर देना चाहते हैं। उनकी सेवा-परायणता, उनका स्नेह, उनका देश-प्रेम, नारी के स्वाभिमान और अपने दायित्व के प्रति ममता और सब से ऊपर उसकी निर्बाध उन्मुक्तता; क्या ये नारी का परिचय नहीं देते? क्या ये गुण आज की नारी के लिए गर्व और गौरव का कारण नहीं हैं? भले ही वह नारी पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण-कहीं की भी हो।

          विचार करें, इसकी तुलना में हम कहाँ खड़े हैं?

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शनिवार, 16 अगस्त 2025

मैं सर्वस्व तेरा ! तेरा ही !...

 



(जन्मास्टमी पर अग्निशिखा के लिए वन्दना की विशेष रचना)

आज कृष्ण कन्हैया की वर्षगाँठ है। चारों तरफ़ उत्साह-ही-उत्साह उफन-उफन कर बह रहा है। कन्हाई के जन्मदिवस के अधिकांश संस्कार पूरे हो गये हैं। महर्षि शाण्डिल्य ब्राह्मणवर्ग के साथ यज्ञ-पूजन करवा चुके हैं। वे सभी प्रसन्न हृदय अपने-अपने घरों की ओर प्रस्थान कर गये हैं। गोप-गोपियाँ भी अपने-अपने उपहार अपने कुँवर कन्हाई को भेंट कर चुकी हैं। अब आयी है कृष्ण के सखाओं की बारी...

हाँ, कन्हाई के सखा भी उन्हें उपहार अवश्य देंगे, लेकिन देंगे अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार। उन बड़े-बड़े गोप-गोपियों में से तो किसी ने भेंट स्वरूप कान्हा को रत्नों का हार पहनाया, किसी ने मणियों के कंकण, कोई उसके लिए बहुमूल्य वस्त्रों का जोड़ा लाया तो कोई ले आया टोकनी-भर खिलौने !

लेकिन कृष्ण के सखाओं का उपहार इन सबसे एकदम भिन्न है-

सबसे पहले आया प्रिय सखा भद्र। छूटते ही बोला- 'कनूँ, मैं तुझे तिलक लगाऊँगा। मेरे पास तो कुछ है नहीं, तेरी ही चहेती गाय, कामदा के गोबर का टीका लगा दूँ तेरे भाल पर?'

'सच! हाँ, हाँ लगा भय्या।' अब नन्दनन्दन तो मानों हर्ष से विभोर हो उठा। कान्हा ने सोचा, अरे, इतनी महत्त्वपूर्ण बात तो महर्षि शाण्डिल्य तक को न सूझी, और उसका सखा भद्र कितना बुद्धिमान् है। भला गोपकुमार का तिलक गोमय के बिना कैसे सम्पूर्ण हो सकता है? भद्र ने अक्षतों के नीचे, ठीक भ्रूमध्य में अपनी अनामिका से गोबर का एक छोटा-सा बिन्दु सजा दिया। कृष्ण अब सब को दौड़-दौड़ कर अपने माथे का तिलक दिखला रहा है और हर्षातिरेक से कहता जा रहा है- 'भद्र ने लगाया है, मेरे भद्र ने!'

और इसके साथ ही सखाओं के अद्वितीय, अनुपम उपहारों का क्रम चल पड़ा... तोक कहीं से एक तिरंगा पुष्प ले आया है- श्याम-श्वेत-अरुण तीनों रंगों की आभा उस फूल की छटा को ऐसा निखार रही है कि कृष्ण उसे अपनी हथेली पर धरे सभी जगह चक्कर लगा-लगा कर अपने मित्र के द्वारा दिये अमोल उपहार के लिए प्रशंसा बटोरता फिर रहा है, झूम-झूम कर हर एक को उसके दर्शन करा रहा है। उसके नेत्र, उसका उल्लास मुखरित हो पूछ रहा है- 'ऐसी अद्भुत वस्तु है किसी के पास? क्या कोई भी रत्न इस अपूर्व निधि के सामने ठहर सकता है?' और उधर तोक... एक छोटे-से उपहार को दे उसने तो मानों सारा त्रिभुवन अपनी मुट्ठी में समेट लिया। हर्ष का पुतला बना वह भी अपने सखा, यानी अपने सर्वस्व के साथ परछाई की तरह फिर रहा है, क्या वही अकेला उनके साथ है? नहीं, नहीं... कान्हा के उतावले मतवाले सभी सखाओं में अपने-अपने उपहार देने की होड़ मची है, कुछ धक्कम-धक्का भी हो रही है, हर एक अपनी भेंट सखा को पहले थमाना चाहता है। कोई नयी-नयी किसलयों का हार पहना रहा है, किसी के हाथ में मोरपंख का गुलदस्ता है, किसी की हथेली यमुनाजी के तट की बालू से सने छोटे-छोटे पत्थरों से भरी है तो कोई और चित्र-विचित्र जंगली फूलों को थाली में सजाये खड़ा है - जितने सखा उतने उपहार और उससे भी सहस्रगुना प्रेम - कन्हाई तो उस बाढ़ में बह गया। सुध-बुध खो बैठा, प्रत्येक भेंट को सिर-आँखों से लगा, निहाल हो उठा।

यह सच नहीं कि अपने अग्रजों द्वारा दिये उपहारों से कान्हा कम आनन्दित हुए थे, लेकिन सखाओं के फूल-पत्ते, कंकड़-पत्थर, पंख आदि पाकर तो यह कन्हाई ऐसा नाचता-कूदता-फाँदता फिर रहा है जैसे धरती पर साक्षात् हर्षोल्लास मूर्तिमान् हो उठा हो! बड़ी देर बाद जब कृष्ण तनिक अपने-आपे में आया तो मैया और बाबा ने बड़े स्नेह से कहा- 'लाल, अब अपने सखाओं को भी उपहार देकर उनका सत्कार करो।'

और कन्हाई दौड़ आया उस राशि के समीप जो मैया ने सजा रखी थी। इस बार यशोदाजी ने अच्छी तरह समझा दिया था नन्द बाबा को इसीलिए बाबा ने महीनों लगाये हैं उपहारों के चयन में, बहुत प्रयत्न करके दूर-दूर से मँगवाये हैं। लेकिन कोई प्रयास सफल नहीं हुआ। उन बहुमूल्य उपहारों में से कोई भी कृष्ण को ऐसा नहीं लगता है जिसे वह अपने किसी भी सखा को दे सके, एक भी उसकी आँखों में नहीं जँचा, उसके हृदय को नहीं भाया। सखाओं के दिये पंखों, पत्थरों, पुष्पों के अतुल्य उपहारों के सम्मुख मणिरत्न-जटित वे सभी उपहार उसे तुच्छ प्रतीत हो रहे थे। बार-बार उसका हाथ अपने भाल पर भद्र द्वारा लगाये गोबर के तिलक पर पहुँच जाता और वह निहाल हो उठता, साथ ही बहुत खिन्न भी, क्योंकि... क्या दे वह अपने मित्रगण को ??? विशाल, अञ्जन रञ्जित कमल लोचन भर आये नन्दनन्दन के। प्रत्येक, प्रत्येक वर्षगाँठ पर ठीक यही दृश्य उपस्थित होता है

कन्हाई की भौहों पर बल पड़े, वह सोचने लगा, सोचता रहा... त्रिभुवन की कोई वस्तु उसे ऐसी न लगी जिसे देकर वह कृतकृत्य हो सके, सन्तोष से ओत-प्रोत हो जाये...। तब ?

कन्हैया ने बलदाऊ को निहारा। दाऊ की आँखों में झांकते ही श्यामसुन्दर हर्षातिरेक से विह्वल हो उठा। उन नयनों से सच्चे प्रेम की जो अजस्र कौंधें छिटक रही थीं उनमें कान्हा ने अपना उपहार पा लिया...। और फिर उसने सामने खड़े भद्र को अपने आलिंगन में जकड़ लिया वाणी नहीं फूट रही, लेकिन कान्हा का रोम-रोम पुकार रहा है, "सखे ! यही है मेरा प्रतिदान 'मैं तेरा, मैं तेरा'।"

तोक, सुबल, श्रीदाम एक-एक को अपने बाहुपाश में बाँध कर कन्हैया सुध-बुध खो बैठा है। प्रत्येक सखा उससे लिपट कर अन्तरतम में यही अनुभव कर रहा है कि साँवरा उसी का प्रियतम सखा है, क्योंकि हर एक को अंक में भर कर कृष्ण का रोम-रोम यही गुञ्जारित-प्रतिगुञ्जारित कर रहा है "मैं सर्वस्व तेरा हूँ, तेरा ही हूँ।"

भक्त को दिये भगवान् के इस उपहार के सम्मुख ब्रह्माण्ड का कौन सा उपहार टिक सकता है भला?

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