रविवार, 21 दिसंबर 2025

फूल औ काँटे

   


          ऐन ऑफिस के समय लगातार एक-के-बाद एक दो ट्रेन के रद्द, (कैंसिल) हो जाने के कारण मेट्रो स्टेशन पर भयंकर भीड़ थी। इस कारण हर आने वाली ट्रेन पहले से ही ठसा-ठस भरी हुई आ रही थी। उनमें चढ़ना और उतरना भी एक युद्ध के समान ही था। सब चढ़ने वाले  पहले चढ़ना चाहते थे लेकिन उधर उतरने वालों को पहले उतरना था। इस जद्दोजहद में कोई किसी को स्थान नहीं दे रहा था। लेकिन फिर भी भरी हुई ट्रेन में भी अनेक लोग जगह बना ही लेते थे, और चढ़ने वाले हर एक को ऐसा लगता था कि उसने कोई किला फतह कर लिया हो। इसी रेलम-पेल में मेट्रो ट्रेन आकर स्टेशन पर रुकी और चढ़ने-उतरने वालों की बीच युद्ध छिड़ गया। कुछ लोग उतरने की कोशिश कर रहे थे लेकिन उसके चौगुने लोग चढ़ने की। उन उतरने वाले लोगों के बीच एक बच्ची भी थी 20-21 वर्ष की। वह उतरने की बहुत कोशिश कर रही थी लेकिन इतनी भीड़ अंदर आ रही थी कि वह किसी भी प्रकार आगे नहीं बढ़ रही थी। उसने लोगों से उतरने के लिए जगह देने की लिए बार-बार अनुनय-विनय किया लेकिन कोई सुन ही नहीं रहा था, सब चढ़ने की जल्दी और धुन में थे। जो सुन भी रहे थे वे बेबस थे, उन्हें भी भीड़ आगे और पीछे से धकेल रही थी। उसे रोना छूट गया उसके आंखों से आंसू निकलने लगे। उस लड़की के पास खड़ी युवती को बच्ची पर दया भी आई और चढ़ती भीड़ पर क्रोध भी। वह सब चढ़ने वालों पर जोर-जोर से चिल्लाने लगी और किसी प्रकार से उन्हें धकेल कर बच्ची के उतरने का रास्ता बना दिया। बच्ची उतर गई और ट्रेन चल पड़ी।

          ट्रेन चलने कुछ ही देर बाद एक यात्री ने खीजते हुए कहा, कैसी लड़की थी, कैसे पैर मार कर गई है।” यह बात उसने इस युवती से कही जिसकी सहायता से बच्ची ट्रेन से उतर सकी  थी। युवती ने धीरे से कहा कि हो सकता है उसका पैर लग गया हो लेकिन जिस प्रकार की भीड़ थी उसने मारा नहीं होगा, पैर लग गया होगा।  

          नहीं हो ही नहीं सकता, उसने एकदम मारा है मेरे को,” उसने क्रोध में कहा।

          अच्छा ठीक है कोई बात नहीं मैं उसकी तरफ से माफी मांगती हूं, गलती हो गई माफ करें।”

          एक बार तो वह चुप हो गया लेकिन उसका अहम शांत नहीं हुआ, “एक तो मेरे को मार गई और आप उसी का पक्ष ले रही हैं। आपकी बहन थी इसीलिए न?”, उसने उसी प्रकार क्रोध से पूछा।

          “वह तो अब है नहीं, मैं उसके बदले आपसे माफी मांग रही हूँ, अब तो आप शांत हो जाइए।”

          “कौन थी वह आपकी लड़की, बहन?, उसने अपना प्रश्न फिर से दोहरा दिया।

          जैसे आप भाई हैं वैसे ही वह बहन थी”, युवती ने धीरे से कहा।

          नहीं, मैं तो आपको नहीं जानता हूं।”

          “लेकिन मैं भी उसे नहीं जानती।”

          उसका मुंह आश्चर्य से खुला रहा गया और शांत होकर चुप हो गया।

          कुछ देर बाद जब युवती उतरने के लिए आगे बढ़ने लगी, उसने कहा ठहरिए मैं आपके लिए जगह बना देता हूँ और सब को ठेल-ठेल कर उसने युवती के उतरने का रास्ता बना दिया।

          याद रखें इन्सानियत, इंसान पैदा करती है और हैवानियत, हैवान। आप जगत में जैसा बदलाव चाहते हैं, खुद में वैसा बदलाव लाएँ।

संत कबीरदास ने कहा है -

"जो तोको कांटा बोए, ताहि बोय तू फूल।

तोको फूल को फूल है, वाको है त्रिशूल।"

          बबूल के बदले बबूल? जगत को बबूल का जंगल बना देगी।

          बबूल के बदले फूल? जगत को फूलों की बगिया बना देगी।  

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यूट्यूब  का संपर्क सूत्र :

https://youtu.be/Sw17IXMGFYo

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फूल औ काँटे

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