शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

मनुर्भव

 



          कुछ वर्ष पुरानी बात है, बेटे के स्कूल समाप्त होने बाद परिवार में सब के मन में एक ही सवाल था - अब आगे क्या? डॉक्टरी, इंजीनियरिंग, बैकिंग, वकालत या कुछ और? लेकिन उसके जवाब से सब हतप्रभ रह गए। वह कार्पेंटर यानि बढ़ई बनना चाहता था। सब चुप रह गए, किसी के मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला।

याद आया उसका मन कभी भी तथाकथित पाठ्यक्रम में नहीं लगा। माँ-बाप हर समय उसके पीछे लगे रहते, परिणाम स्वरूप उसने अच्छे नंबरों से स्कूल की पढ़ाई पूरी की। उसका दाखिला एक प्रतिष्ठित कॉलेज में करा दिया। लेकिन कॉलेज से उसकी निरंतर शिकायतें आती रहतीं। आखिर एक दिन कॉलेज के प्रिंसपल का बुलावा आ ही गया। अभिभावक सकपकाते हुए उसके दफ्तर में घुसे। उन्होंने कहा “आप अपने बच्चे का भविष्य बिगाड़ने में क्यों लगे हैं?...” इसके पहले कि वे कुछ कहते उन्होंने आगे जोड़ा, “...अपने सपनों को उस पर लाद कर! उसे वह बनने दीजिये जो वह बनना चाहता है, उसका सहयोग कीजिये, विरोध नहीं।”

          वहाँ फिर क्या हुआ, इसे छोड़ हम चलते हैं अपने मुख्य विषय पर। हम अपने बच्चे पर अपने सपने क्यों लादना चाहते हैं? यह हमें स्वीकार करना होगा कि ऐसी सोच का कारण है कि हम अपने बच्चों को “नोट छापने की मशीन” बनाना चाहते हैं और इसलिए हमारी शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य यही हो गया है। पैसा हर एक को चाहिए। हाँ, यह सही है कि पैसा जीवन में एक बड़ी चीज़ है। पर, जब पैसा सबसे बड़ी चीज़ बन जाता है तो वह जीवन के प्रति हमारी दृष्टि को सर्वथा दूषित कर देता है, जिसका प्रभाव स्वभावतः शिक्षा पर पड़ता है।

          कॉलेज को, छोड़िए नर्सरी की उम्र के बच्चों के “अच्छे” विद्यालयों में प्रवेश के लिए माता-पिता कितनी दौड़-धूप और खर्च करते हैं? केवल कुछ बच्चों को दाखिला मिलता है और बाकी बच्चे जीवन की दौड़ शुरू होने से पहले ही हारे हुए घोषित कर दिए जाते हैं। इसका बच्चों पर कितना घातक प्रभाव पड़ता है इस पर हमारा ध्यान नहीं जाता।

          यह चिन्ता स्वाभाविक है कि शिक्षा के नाम पर हमारे बच्चे जानकारी हासिल कर लेते हैं पर मनुष्य के रूप में, और समाज के उपयोगी सदस्य के रूप में जीवन बिताने के लिए आवश्यक चारित्रिक गुण उनमें नहीं आते। पर इस कमी को दूर करने का उपाय यह भी नहीं है कि चारित्रिक गुणों की परीक्षा या मूल्यांकन का विषय बना दिया जाए। इसका मूल्यांकन परीक्षा द्वारा नहीं किया जा सकता।

          धर्म में भी ऐसा ही होता है। कौन कितना धार्मिक है यह सतही तौर पर देखने का पैमाना बनाया जा सकता है। कौन कितनी बार नमाज़ पढ़ता है, कितनी बार मंदिर जाता है, कितने लोगों को अपने धर्म में दीक्षित करता है, कौन कितना दान देता है आदि बातों को देखकर धार्मिकता का प्रमाणपत्र दिया जा सकता है। पर धर्म को सही अर्थ में समझने वाले लोग जानते हैं कि इन बातों का सच्ची धार्मिक भावना से दूर का भी संबंध नहीं है। वास्तव में धर्म के संबंध में किसी भी चीज़ को बाहरी पैमाने से नहीं नापा जा सकता।

          बिल्कुल यही बात शिक्षा पर लागू होती है। जिसे नापा जा सकता है वह असली शिक्षा नहीं है क्योंकि असली शिक्षा को नापा नहीं जा सकता । आज कि शिक्षा जानकारी हो सकती है, दिखावा हो सकती है, पर सच्ची शिक्षा नहीं। आइन्स्टाइन ने कहा था, "जो कुछ हमने विद्यालय में सीखा था उसे भूल जाने के बाद हमारे अंदर जो शेष रहता है वह शिक्षा है।" सच्ची शिक्षा मनुष्य के अंदर परिवर्तन लाती है जिसे अनुभव किया जा सकता है मापा नहीं जा सकता।

          परीक्षा में वे सवाल पूछे जाते हैं जिनका उत्तर तय हो, और विद्यार्थी परीक्षा-पुस्तिका में वहीं लिखते हैं जो उसके परीक्षक को पसन्द हो। विद्यार्थी को अपनी डिग्री मिल जाती है, अध्यापक को अपना वेतन, शिक्षा से दोनों ही वंचित रहते हैं।

          चारित्रिक गुणों के आकलन को परीक्षा से दूर रखा जाए और इनके विकास के लिए सतत प्रयास होना चाहिए। पर हमें यह मानकर चलना होगा कि चारित्रिक गुणों का आकलन करने की विधि का विकास करने में आजतक किसी भी शिक्षाशास्त्री, दार्शनिक या धार्मिक नेता को सफलता नहीं मिली है। चारित्रिक गुण बहुत कुछ परिवार, समाज, धर्म आदि से आते हैं। विद्यालय, इनके विकास के लिए अधिकाधिक प्रयास कर सकता है पर उस विकास में निश्चित सफलता का दावा कभी नहीं कर सकता।

          तब क्या किया जाए? फिलहाल अभी इसका एक ही उपाय नजर आता है, इसका उत्तरदायित्व बच्चों के अभिभावक, आस-पड़ोस और समाज उठाए और सब मिलकर उसमें सहयोग करें। अभिभावक और समाज इस बात को समझें और इस महत कार्य को अपना समय दें तथा ट्यूटर या विद्यालय पर बच्चों को न छोड़ें। इस बात के प्रति आशावान रहें कि एक समय ऐसा आयेगा शिक्षा शास्त्री इसका हल ढूंढ निकलेंगे। धीरे-धीरे अनेक आश्रमों, आध्यात्मिक गुरुओं ने ऐसे विद्यालयों की स्थापना की है जहां अन्य विद्यालयों के पाठ्यक्रम के अलावा “मनुर्भव, “मानव” बनने की भी शिक्षा दी जाती है।

          उदाहरण के लिए देश भर में फैले सीबीएसई (CBSE) स्कूल हैं, जो अकादमिक उत्कृष्टता के साथ-साथ बच्चों के मानसिक, शारीरिक, भावनात्मक, नैतिक  और आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा देते हैं-

          1। आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के संस्थापक गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर द्वारा स्थापित

          2। श्री अरविंद आश्रम द्वारा संचालित विद्यालय

          3। चिन्मय मिशन द्वारा संचालित विद्यालय  

          ऐसे विद्यालयों की संख्या भी धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है और जनता में इनके प्रति  आकर्षण है। हो सकता है वे ही इसका कोई समाधान तैयार कर सकें।

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यूट्यूब  का संपर्क सूत्र :

https://youtu.be/aZaMn0F8UFU


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