शनिवार, 21 मार्च 2026

खूब सोचो, खूब दौड़ो

 



कोरोना काल में अनेक हिन्दी साहित्यिक पत्रिकाओं का देहांत हो गया, कुछ एक जो बचीं उनमें एक है नवनीत। आज अचानक उसी नवनीत की एक पुरानी प्रति हाथ लगी। पत्रिका में हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा की एक वार्ता छपी थी, पुरुष-विमर्श पर। शर्मा जी कह रहे थे कि विमर्श चाहे जिसके ऊपर हो, उसमें एकपक्षीय बात कभी नहीं होनी चाहिये। दोनों पक्ष को समझना आवश्यक है।  

          अगर पूछा जाए कि दोषी कौन हैमहिला या पुरुष?  तो सही माने में दोषी ये दोनों ही नहीं बल्कि शिक्षा है, क्योंकि लोग साक्षर हो रहे हैं, शिक्षित नहीं। गांधी ने भी कहा था -  “सरकार द्वारा चलाये गए साक्षरता अभियान से लोग साक्षर हो रहे हैं पर शिक्षित नहीं”। जिस दिन से लोग शिक्षित होने लगेंगे उस दिन किसी भी विमर्श की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी।

          किसी काम को यह सोचकर नहीं करना चाहिए कि बदलाव आयेगा या नहीं? असरदार होगा या नहीं? गांधी ने कभी नहीं सोचा कि मेरे अकेले से क्या होगा, बस चल पड़े थे कारवां तो अपने आप जुड़ने लगा। कोई भी अच्छा काम भले ही त्वरित प्रभाव न डाले पर कुछ समय बाद उसका प्रभाव अवश्य दिखाई पड़ता है। मेरे अकेले के करने से क्या होगा?’ यह सोच कर कदम ही न बढ़ाना, कहीं की समझदारी नहीं है।

          आज जिसको हम समस्या मान रहे हैं पहले इसे समस्या नहीं अपना कर्तव्य में समझते थे। संयुक्त परिवार होता था। सब मिल-जुल कर रहते, काम करते और खुश रहते थे। पुराने समय में लोग अपनी लड़कियों की शादी भी खानदानी घर देखकर करते थे। आजकल लोग एकल परिवार ढूंढ़ते हैं, सोचते हैं कि उनकी बेटी वहाँ राज करेगी, उसे अधिक काम नहीं करना पड़ेगा। शर्मा जी बताते हैं कि वे आज तक नहीं समझ पाये कि उनकी माँ का विवाह पिताजी से कैसे हुआ? पिताजी दो हज़ार की आबादी वाले कस्बे में रहते थे, जहां स्टेशन से गांव तक बैलगाड़ी से पांच घंटे लगते थे, वहां दिल्ली की लड़की, उनकी माँ का विवाह कैसे कर दिया गया? लेकिन मां को कभी नहीं लगा कि उनका विवाह कहां कर किया गया? वे अपने परिवार के बीच हमेशा खुश रहीं।  हर जिम्मेवारी बखूबी और हंसी-खुशी निभाया। विवाह इसलिए हुआ कि घर बहुत खानदानी था। समस्या, 'मैं' और 'मेरे' के भाव ने ही पैदा की हैं और कुछ नहीं।

          हमारी बढ़ी हुई आवश्यकताओं, लालच और लालसाओं ने हमारी यह दुर्गति की है। एकल परिवार, दिखावा, आधुनिकता, महत्वाकांक्षा ने हमें बर्बाद किया है। घर में बच्चे अपनी ही धुन में मस्त हैं। उनके लिए तो जैसे घरवालों के लिए समय ही नहीं है। मोबाइल में चैट करते रहेंगे लेकिन घर में एक-दूसरे से बात नहीं करेंगे।  

          संतोष को महत्व दें। लेकिन, संतुष्ट होकर एक जगह रुकना नहीं है। सतत् अपना काम करते रहें। विशेषकर कला के क्षेत्र में यह इच्छा ज़रूर हो कि अच्छा करूँ और अच्छा करूँ, पर कभी यह नहीं चाहना कि अन्य किसी कलाकार से अच्छा करूँ, और उससे ऊपर पहुंच जाऊं। यह बेहतर बनने की होड़ है, जो दुख का कारण है। दरअसल हमारे पास जो है वो हमें सुख नहीं देता बल्कि दूसरों के पास जो सुख है वो हमें दुख देता है। दूसरों का सुख मेरा दुख हो गया है और दूसरों का दुख अपना सुख।  ज़िंदगी में कोई निश्चित लक्ष्य भले ही निर्धारित न करें, लेकिन चलना कभी नहीं रोकें।

खुश रहने का मूलमंत्र यह है कि सोचो, खूब सोचो, बस यह देखते रहो कि तुम्हारी सोच ने किसी की प्रसन्नता तो नहीं छीनी? दौड़ो,खूब दौड़ो लेकिन ये बात देखते रहो कि किसी और को रौंदा तो नहीं! खूब तरक्की करो बस एक बात देखते रहो कि तुम्हारे पांव ने ज़मीन तो नहीं छोड़ी। आज लोग बिकाऊ अधिक हो गये हैं। कमाई न हो तो नंगे रहो, पर नंगेपन की कमाई न करो।

          यह बात सुनने में अप्रिय ज़रूर लग रही है पर सत्य है। सच बोलो लेकिन कहां बोलना है, किससे बोलना है कैसे बोलना है, इस बात का ध्यान ज़रूर रखो। जो यह कहता है कि वह कभी झूठ नहीं बोलता समझ लो वह सबसे ज़्यादा झूठ बोलता है, पर इंसानियत के लिए बोला गया झूठ सौ प्रतिशत सच के बराबर है।

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यूट्यूब  का संपर्क सूत्र :

https://youtu.be/PRtXIfkxako

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