एक व्यक्ति के पास कुछ
प्यारे-प्यारे पिल्ले थे। उसकी इच्छा थी कि
कोई उन्हें ले जाए और उनकी अच्छी तरह से देखभाल करे। पास-पड़ोसियों से पूछ
आया लेकिन कोई लेना नहीं चाहता था। आख़ीर
उसने घर के सामने चलती सड़क के किनारे के खम्भे पर यह सूचना बड़े-बड़े अक्षरों में
टाँग दी-
"बच्चा, बूढ़ा, जवान, मर्द, औरत- जो चाहे मेरे यहाँ से छोटे-छोटे,
सुन्दर पिल्ले ले जा सकता है-बिलकुल मुफ़्त!"
अपने सूचना-पट्ट की अन्तिम कील ठोंकने के साथ-साथ
उसे कुछ महसूस हुआ। नीचे झुक कर देखा, पाँच-छह साल का एक बच्चा उसकी कमीज़ का सिरा
हाथ से खींच रहा था-
"सर", बच्चा बोला, "मैं
आपका एक पिल्ला लेना चाहता हूँ।"
उसने मुसकुराते हुए उसे देखा, "ठीक है मेरे प्यारे बच्चे, एक नज़र मेरे
सभी पिल्लों पर डाल लो; फिर एक क्यों,
दो ले जाओ।" इतना कह कर उस व्यक्ति ने सीटी बजायी नहीं कि बगीचे के दूसरे छोर
से चार गेंद-जैसे गोल-मटोल पिल्ले दौड़ते-भागते, लुढ़कते-पुढ़कते आते
दिखायी दिये। बच्चे की आँखों में ख़ुशी दौड़ गयी। लेकिन यह
क्या? आखिर में एक नन्हीं गेंद और प्रकट हो गयी! औरों से ज़्यादा
छोटा वह पिल्ला भागता-लँगड़ाता-सा दूसरों को पकड़ने की कोशिश में लगा था।
अचानक बच्चा ख़ुशी से उछल पड़ा। अन्तिम पिल्ले
की तरफ़ इशारा कर बोला- "जी, मुझे वह नाटा पिल्ला चाहिये। मैं वही लूँगा।"
वह ताली बजाने लगा। वह व्यक्ति घुटनों के बल बच्चे के सामने बैठ, उसका हाथ
पकड़ कर बोला- "बेटे, तुम इसे लेना चाहोगे? इसका एक पैर ठीक नहीं है, तभी तो
लँगड़ाता है। यह कभी भी तुम्हारे साथ उस तरह नहीं खेल पायेगा, दौड़ नहीं पायेगा जिस तरह ये चारों कर पायेंगे। इनमें से चुनो बच्चे, उसको
तो मैं ही पाल लूँगा।"
वह
बालक दो क़दम पीछे हटा, नीचे झुक कर उसने दाहिनी पैंट की मोहरी
घुटने तक उठा दी। वह व्यक्ति हक्का-बक्का रह गया। घुटने के नीचे का उसका पैर नक़ली
था जो स्टील के 'ब्रेस' के सहारे उसके विशेष जूते से बँधा था।
"सर, देखिये, मैं ख़ुद भी न उस तरह खेल सकता हूँ, न दौड़ सकता
हूँ जिस तरह मेरे दूसरे दोस्त सरपट भागते हैं। आपके दूसरे पिल्लों को तो मेरे दूसरे
कई दोस्त मिल जायेंगे, लेकिन इस नाटे को किसी मेरे जैसे की ही ज़रूरत है जो इसके दिल
को पढ़ सके।"
बच्चे
के ललाट को चूमते हुए उसने कहा- "बेटे, भगवान् का रूप लेकर
आये हो तुम इसके लिए, और इसने भी शायद तुम्हारे ही लिए इस धरती पर आँखें खोली हैं।
मैं बहुत खुश हूँ कि मेरे इस नन्हें को तुम्हारे जैसा एक नन्हा, सच्चा साथी मिल गया
है।"
अपने
नाटे पिल्ले को ख़ुशी-खुशी बच्चे के हाथ में थमाते हुए उस व्यक्ति ने एक बार फिर दोनों
को बाहों में समेट लिया और उनके ललाट चूम लिये।
जब आप की नजर किसी पर आत्म-भाव से पड़ती
है तब उसका स्वरूप बदल जाता है।
'पूज कर देव देखो।'- मूर्ति की पूजा
कर फिर उसे देखोगे, तो देव दिखेंगे।
'बीज बोकर खेत देखो'- बिना बीज बोये खेत पर जाओगे को वहाँ घास ही दिखायी देगी।
‘पवित्र भावना की चादर ओढ़ कर संसार
की ओर देखो, तो वह परम पवित्र दिखायी देगी।
माँ बच्चे को प्रेम से सजाती है,
सुंदर वस्त्र पहनाती है, काजल का टीका लगती
है, तो वह सुन्दर दिखायी देता है।
इस तरह आत्म-भावना से विश्व को सजाओ, चमकाओ,
मण्डित करो, आच्छादित करो और फिर देखो,
आत्मीयता के कारण वह सुन्दर और प्रिय दिखाई देगा।
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